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ज्यादातर हिंदू व्रत और त्योहार दो दिन क्यों पड़ते हैं? समझिए सही तिथि का पूरा गणित

Hindu Vrat Tyohar

“रक्षाबंधन आज है या कल?” “दिवाली 31 की है या 1 की?” पिछले कुछ सालों से लगभग हर बड़े त्योहार पर हमारे घर और व्हाट्सएप ग्रुप्स में यही चर्चा सबसे ज्यादा होती है।

आपने भी अक्सर गौर किया होगा कि अचानक से हमारे ज्यादातर हिंदू व्रत और त्योहार दो-दो दिन पड़ने लगे हैं। इससे मन में यह शंका आना लाजमी है कि आखिर हम सही दिन त्योहार मना भी रहे हैं या नहीं? क्या यह पंडितों का कोई मतभेद है, या इसके पीछे कोई गहरा विज्ञान छिपा है?

आइए आज इस पूरी उलझन को एकदम आसान भाषा में समझते हैं।

तारीख और ‘तिथि’ के बीच का असली खेल

त्योहारों के दो दिन बंटने का सबसे बड़ा कारण है हमारे कैलेंडर का सिस्टम। हम अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में जो कैलेंडर (जनवरी-फरवरी वाला) इस्तेमाल करते हैं, वह सूर्य पर आधारित है। इसमें एक दिन फिक्स 24 घंटे का होता है—रात 12 बजे से अगली रात 12 बजे तक।

लेकिन, हमारे हिंदू व्रत और त्योहार पंचांग के हिसाब से तय होते हैं, जो मुख्य रूप से चंद्रमा की गति (Lunar System) पर चलता है।

पंचांग में ‘दिन’ नहीं, बल्कि ‘तिथि’ होती है (जैसे- प्रथमा, द्वितीया, एकादशी)। चंद्रमा की चाल कभी धीमी तो कभी तेज होती है। इसी वजह से एक तिथि फिक्स 24 घंटे की नहीं होती। यह 19 घंटे से लेकर 26.5 घंटे तक खिंच सकती है। अब सोचिए, जब एक तिथि 24 घंटे से ज्यादा या कम की होगी, तो जाहिर है वह अंग्रेजी कैलेंडर की दो तारीखों को छुएगी ही। बस, यही से दो दिन वाले त्योहार की शुरुआत होती है।

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‘उदया तिथि’ का नियम क्या है?

हिंदू धर्म में दिन की शुरुआत रात 12 बजे से नहीं, बल्कि सूर्योदय से मानी जाती है। शास्त्रों में ‘उदया तिथि’ को सबसे ज्यादा अहमियत दी गई है।

इसे एक उदाहरण से समझते हैं: मान लीजिए एकादशी आज दोपहर 3 बजे शुरू हुई और कल सुबह 7 बजे खत्म हो जाएगी। कल सूर्योदय सुबह 6 बजे हुआ। चूंकि कल सूरज निकलते समय एकादशी तिथि मौजूद थी, इसलिए वह पूरी तरह से ‘उदया तिथि’ बन गई। अब भले ही कल सुबह 7 बजे के बाद द्वादशी लग जाए, लेकिन आम लोगों के लिए व्रत और त्योहार कल के ही दिन मान्य होगा।

यही कारण है कि कोई त्योहार शुरू तो आज हो जाता है, लेकिन मनाया कल जाता है।

क्या हर त्योहार उदया तिथि से ही तय होता है?

यहीं पर थोड़ा सा पेंच है। सारे त्योहार उदया तिथि के भरोसे नहीं मनाए जा सकते। कुछ व्रत और त्योहार ऐसे होते हैं, जिनका फल किसी खास समय (मुहूर्त) पर ही मिलता है।

  • रात की पूजा वाले त्योहार: महाशिवरात्रि या होलिका दहन जैसे त्योहारों में रात का महत्व होता है। अगर चतुर्दशी तिथि उदया तिथि में नहीं है, लेकिन रात के समय पड़ रही है, तो पूजा उसी रात को होगी।

  • शाम की पूजा: प्रदोष व्रत या करवा चौथ में चंद्रमा या शाम (प्रदोष काल) की अहमियत है। इसलिए इन्हें उस दिन मनाया जाता है, जिस दिन शाम के समय वह खास तिथि मौजूद हो।

  • नक्षत्रों का संयोग: श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के लिए सिर्फ अष्टमी तिथि ही नहीं, बल्कि ‘रोहिणी नक्षत्र’ का होना भी जरूरी है। अगर दोनों का सटीक योग अगले दिन बन रहा है, तो जन्माष्टमी उसी दिन मनाई जाएगी।

इसके अलावा, शुभ काम करते समय राहुकाल या ‘भद्रा’ (जैसे रक्षाबंधन के समय) का भी ध्यान रखा जाता है। अगर पहले दिन भद्रा का साया है, तो त्योहार को अगले दिन के शुभ मुहूर्त के लिए टाल दिया जाता है।

तो आम इंसान क्या करे? सही दिन कैसे चुनें?

यह सब खगोलीय गणित (Astronomy) है, जिसे खुद से कैलकुलेट करना आम आदमी के लिए मुमकिन नहीं है। यह कोई अंधविश्वास या गलती नहीं है, बल्कि हमारे ब्रह्मांड और ग्रहों की एकदम सटीक चाल है।

सही दिन त्योहार मनाने का सबसे बेहतरीन तरीका यही है कि आप अपने स्थानीय विद्वान पंडितों या अपने शहर के किसी प्रामाणिक पंचांग (जैसे काशी या ऋषिकेश पंचांग) पर भरोसा करें। जो तिथि समाज और आपके क्षेत्र के पंडित तय करें, उसी दिन पूरे परिवार के साथ श्रद्धा से त्योहार मनाएं। क्योंकि अंत में, ईश्वर आपकी तारीख नहीं, आपका भाव देखता है।

अस्वीकरण: यह जानकारी विभिन्न धार्मिक मान्यताओं, ज्योतिषीय सिद्धांतों और पंचांग के सामान्य नियमों के आधार पर लिखी गई है। किसी भी त्योहार या व्रत के सटीक मुहूर्त और दिन के लिए हमेशा अपने स्थानीय पुरोहित या मान्यता प्राप्त पंचांग की सलाह ही लें।

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