
शाजापुर। शहर की संकरी सड़कों और व्यस्त इलाकों में नियमों को ताक पर रखकर होने वाले निर्माण किस तरह प्रशासनिक व्यवस्था को ठेंगा दिखाते हैं, इसका एक जीता-जागता उदाहरण हरायपुरा रोड पर देखने को मिल रहा है। वार्ड क्रमांक-17 में स्थित यह इलाका शहर के सबसे व्यस्त मार्गों में से एक है, लेकिन यहाँ नियमों की अनदेखी कर बनाई गई एक व्यावसायिक इमारत अब स्थानीय प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर रही है। हैरानी की बात यह है कि जिस निर्माण को चार साल पहले खुद नगर पालिका ने अवैध माना था, वह हटा तो नहीं, बल्कि अब वहाँ पक्की दुकानें सज चुकी हैं।
कागजों में सिमट कर रह गया सरकारी नोटिस

पूरा मामला साल 2021 के आखिरी महीनों का है। नगर पालिका परिषद शाजापुर ने बकायदा एक आधिकारिक सूचना पत्र (क्रमांक/निर्माण/2021/4068) जारी किया था। इस नोटिस में साफ शब्दों में लिखा गया था कि यह निर्माण बिना किसी भवन अनुज्ञा (बिल्डिंग परमिशन) के किया जा रहा है और यह पूरी तरह से कानून के खिलाफ है। नगर पालिका अधिनियम 1961 की धारा 187(क) का हवाला देते हुए निर्माणकर्ता को साफ चेतावनी दी गई थी कि तीन दिन के भीतर इस अवैध ढांचे को हटा लिया जाए, वरना प्रशासन इसे खुद जमींदोज कर सख्त कानूनी कार्रवाई करेगा।
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लेकिन आज साल 2026 में जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां कर रही है। चार साल बीत जाने के बाद भी उस सरकारी कागज के टुकड़े का असर जमीन पर रत्तीभर भी नजर नहीं आया। कार्रवाई की फाइलें दफ्तरों की धूल फाँकती रहीं और वहाँ बिना किसी खौफ के एक आलीशान कमर्शियल बिल्डिंग खड़ी हो गई।
न नक्शा पास, न अनुमति: आवासीय क्षेत्र में कमर्शियल खेल
इस पूरे मामले में नियमों को जिस तरह से मरोड़ा गया है, वह चौंकाने वाला है। यह पूरा इलाका शुद्ध रूप से आवासीय (Residential) घोषित है। नियमानुसार यहाँ किसी भी तरह की व्यावसायिक गतिविधि की अनुमति नहीं दी जा सकती। इस निर्माण के लिए न तो नगर पालिका से कोई वैध इजाजत ली गई और न ही नगर तथा ग्राम निवेश विभाग (टीएंडसीपी) से इसका कोई नक्शा पास हुआ। सवाल यह उठता है कि जब शुरुआत में ही इस पर आपत्ति दर्ज की गई थी, तो फिर प्रशासन की नाक के नीचे इसकी नींव से लेकर छत तक का सफर कैसे तय हो गया? क्यों समय रहते काम को बीच में नहीं रुकवाया गया?
12 फीट की संकरी सड़क पर रोज लग रहा जाम
इस अवैध निर्माण का सबसे खमियाजा यहाँ से गुजरने वाले आम राहगीरों और स्थानीय निवासियों को भुगतना पड़ रहा है। हरायपुरा रोड की चौड़ाई महज 12 फीट के आसपास है, जो शहर के मुख्य आवागमन मार्गों में शामिल है। टाउन प्लानिंग के बुनियादी नियमों के मुताबिक, किसी भी सड़क पर निर्माण करते समय नाली और सड़क से एक तय दूरी (सेटबैक) छोड़ना जरूरी होता है ताकि भविष्य में ट्रैफिक की समस्या न हो।
यहाँ इस नियम को पूरी तरह से दरकिनार कर दिया गया। दुकान को सीधे सड़क से सटाकर खड़ा कर दिया गया है। इमारत में पार्किंग के लिए एक इंच की जगह भी नहीं छोड़ी गई है, जिसके कारण यहाँ आने वाले ग्राहकों की गाड़ियाँ और दोपहिया वाहन मुख्य सड़क पर ही खड़े रहते हैं। सड़क पहले से ही संकरी है और ऊपर से बेतरतीब खड़े वाहन; नतीजा यह होता है कि यहाँ दिनभर जाम की स्थिति बनी रहती है। स्थानीय लोगों का कहना है कि संकरे रास्ते पर गाड़ियों की इस भीड़ की वजह से आए दिन पैदल चलने वालों को परेशानी होती है और हर वक्त किसी बड़े हादसे का डर बना रहता है।
व्यवस्था की शिथिलता और उठते कुछ गंभीर सवाल
जानकारों की मानें तो यह शहर का कोई इकलौता मामला नहीं है। कई इलाकों में यह एक आम ढर्रा बन चुका है, जहाँ शुरुआत में नियमों के उल्लंघन पर औपचारिकता के लिए नोटिस तो जारी कर दिए जाते हैं, लेकिन बाद में उन फाइलों पर गहरी चुप्पी साध ली जाती है। समय-समय पर बड़े अधिकारियों द्वारा अवैध निर्माणों पर कड़ी कार्रवाई के दावे तो किए जाते हैं, लेकिन मैदानी स्तर पर नतीजा हमेशा सिफर ही रहता है।
इस मामले में जब स्थानीय प्रशासन के मौजूदा नेतृत्व से बात की गई, तो उनका कहना था कि मामला पुराना है और उनके आने से पहले का है। हालांकि, उन्होंने आश्वस्त किया है कि इस पूरे मामले के रिकॉर्ड और फाइलों को दोबारा दिखवाया जा रहा है और नियमों के तहत जो भी उचित वैधानिक कदम होंगे, वे उठाए जाएंगे।
प्रशासनिक आश्वासनों से इतर, अब जनता के बीच कुछ बुनियादी और सुलगते सवाल हैं:
अगर तीन दिन में निर्माण हटाने का नोटिस जारी हुआ था, तो चार साल तक प्रशासनिक अमला किस ढिलाई के इंतजार में बैठा रहा?
क्या केवल नोटिस की औपचारिकता पूरी कर लेना ही नगरीय निकाय की जिम्मेदारी है, या नियमों को जमीन पर लागू करवाना भी उनका काम है?
क्या इस तरह की लंबी ढील देकर पिछले दरवाजे से ऐसे अवैध निर्माणों को बढ़ावा देने की परंपरा शुरू की जा रही है?
शहर के व्यवस्थित विकास और आम जनता की सुरक्षा के लिए यह बेहद जरूरी है कि प्रशासन केवल कागजी पत्राचार और नोटिसों के खेल से आगे बढ़कर जमीनी स्तर पर निष्पक्ष और सख्त कार्रवाई सुनिश्चित करे।
इनका कहना
इस पूरे मामले में जब वर्तमान मुख्य नगर पालिका अधिकारी (सीएमओ) भूपेंद्र कुमार दीक्षित से बात की गई, तो उनका जवाब खुद व्यवस्था की लाचारी बयां कर गया। उनका कहना था — “मैं कुछ समय के लिए यहां से बाहर चला गया था, अभी पुनः वापस आया हूं। मुझे इस मामले का संज्ञान नहीं था, अच्छा हुआ आपने बता दिया। हम नियमानुसार वैधानिक कानूनी कार्यवाही करेंगे। इस मामले संज्ञान में लेकर नोटिस जारी कर उचित कार्यवाही होगी।” सीएमओ का यह बयान इस बात की तस्दीक कर देता है कि नियम विरुद्ध खड़ी इमारत अब लगभग “स्वीकृत” मान ली गई हैं, और 4 साल पुराना नोटिस महज एक फाइल बनकर धूल खा रहा था
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