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स्कूलों में बच्चों को सिखाना होगा ‘गुड टच-बैड टच’, पॉक्सो एक्ट को लेकर 200 प्राचार्यों की लगी क्लास; लापरवाही पर होगी जेल

POCSO Act training Ujjain

उज्जैन। बच्चों को सुरक्षित, संवेदनशील और भयमुक्त वातावरण देने के उद्देश्य से उज्जैन जिला प्रशासन ने एक बड़ी पहल की है। जिला पंचायत के सभाकक्ष में महिला एवं बाल विकास विभाग के जिला कार्यक्रम अधिकारी श्री ब्रजेश कुमार त्रिपाठी के मार्गदर्शन में शासकीय हाई और हायर सेकंडरी स्कूलों के प्राचार्यों के लिए एक दिवसीय विशेष जागरूकता प्रशिक्षण कार्यक्रम का आयोजन किया गया।

इस महत्वपूर्ण कार्यशाला में जिले के लगभग 200 शासकीय स्कूलों के प्राचार्यों ने हिस्सा लिया, जिन्हें पॉक्सो अधिनियम, 2012 (POCSO Act) की कानूनी बारीकियों और स्कूल की जिम्मेदारियों से रूबरू कराया गया।

24 घंटे के अंदर रिपोर्टिंग अनिवार्य, वरना भुगतना पड़ेगा डंडा: कानूनी विशेषज्ञ

ट्रेनिंग प्रोग्राम में मुख्य वक्ता एवं उच्च न्यायालय की अधिवक्ता सुश्री सलोनी बाहेती ने पॉक्सो एक्ट के कड़े प्रावधानों पर प्रकाश डाला। उन्होंने स्पष्ट किया कि बच्चों के प्रति होने वाले किसी भी लैंगिक अपराध की जानकारी मिलते ही स्कूलों को 24 घंटे के भीतर पुलिस, चाइल्ड हेल्पलाइन (1098) या बाल कल्याण समिति (CWC) को सूचित करना अनिवार्य है।

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कानून के कड़े नियम:

  • अनिवार्य रिपोर्टिंग (धारा 19 व 21): यदि कोई प्राचार्य या शिक्षक मामले को छुपाता है या सूचना देने में देरी करता है, तो कानून में उसके लिए सीधे तौर पर सजा (दंड) का प्रावधान है।

  • पहचान छिपाना जरूरी: किसी भी परिस्थिति में पीड़ित बच्चे या बच्ची की पहचान उजागर नहीं की जा सकती।

  • सुरक्षा के उपाय: हर स्कूल में अनिवार्य रूप से शिकायत पेटी (कम्प्लेंट बॉक्स) लगाई जाए और ‘बाल संरक्षण समिति’ का गठन किया जाए।

  • जागरूकता: बच्चों को उनकी उम्र के हिसाब से “गुड टच-बैड टच” की सही जानकारी दी जाए।

शिक्षक केवल पढ़ाएं नहीं, रक्षक भी बनें

जिला शिक्षा अधिकारी श्री महेंद्र खत्री ने प्राचार्यों को संबोधित करते हुए कहा कि पॉक्सो कानून महज एक किताबी व्यवस्था नहीं है, बल्कि यह बच्चों की गरिमा की रक्षा करने वाला मजबूत ढाल है। प्रत्येक शिक्षक और प्राचार्य को इसकी पूरी एबीसीडी (जानकारी) होनी चाहिए ताकि सही समय पर सही एक्शन लिया जा सके।

वहीं, जिला कार्यक्रम अधिकारी श्री ब्रजेश कुमार त्रिपाठी ने भावुक अपील करते हुए कहा कि बच्चे हमारे समाज की सबसे अनमोल धरोहर हैं। स्कूल उनके विकास का सबसे मुख्य केंद्र है, इसलिए शिक्षकों का काम सिर्फ सिलेबस पूरा कराना नहीं, बल्कि बच्चों के भीतर सुरक्षा और अटूट विश्वास का माहौल पैदा करना भी है।

वन स्टॉप सेंटर की सेवाओं से कराया अवगत

कार्यक्रम के दौरान वन स्टॉप सेंटर की प्रशासक श्रीमती वीणा बौरासी ने भी उपस्थित प्राचार्यों को केंद्र की कार्यप्रणाली के बारे में बताया। उन्होंने जानकारी दी कि कैसे पीड़ित महिलाओं और बालिकाओं को एक ही छत के नीचे कानूनी, चिकित्सकीय और मानसिक सहायता उपलब्ध कराई जाती है।

इनकी रही गरिमामय उपस्थिति:

इस कार्यक्रम का कुशल संचालन महिला एवं बाल विकास विभाग की विधि सह परिवीक्षा अधिकारी श्रीमती प्रियंका त्रिपाठी ने किया। इस दौरान विभाग की सहायक संचालक श्रीमती रीना शर्मा, संरक्षण अधिकारी श्रीमती अमृता सोनी सहित कई सामाजिक कार्यकर्ता, परामर्शदाता और आउटरीच वर्कर्स मौजूद रहे।

निष्कर्ष: इस प्रशिक्षण का मुख्य उद्देश्य स्कूलों को बच्चों के लिए पूरी तरह ‘चाइल्ड-फ्रेंडली’ और सुरक्षित बनाना है, ताकि कोई भी बच्चा खुद को असुरक्षित महसूस न करे।

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