कावेरी को मिला नया जीवन: भारत ने छठी पीढ़ी के फाइटर जेट इंजन की ओर बढ़ाए मजबूत कदम
Kaveri Engine Defense Self Reliance India
देश के पहले स्वदेशी फाइटर जेट ‘तेजस’ (Tejas) प्रोजेक्ट से अलग किए जाने के लगभग 18 साल बाद, भारत के महत्वाकांक्षी कावेरी जेट इंजन प्रोजेक्ट (Kaveri Engine Project) में एक बार फिर नई जान फूंक दी गई है। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह द्वारा रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) के वैज्ञानिकों को अगले 5 से 7 वर्षों के भीतर छठी पीढ़ी (6th Generation) के फाइटर इंजन विकसित करने का बेहद महत्वाकांक्षी लक्ष्य देने के बाद यह लंबित प्रोजेक्ट वैश्विक सुर्खियों में लौट आया है।
कावेरी इंजन के हालिया सफल आफ्टरबर्नर परीक्षण (Afterburner Test) और सैन्य उड्डयन के क्षेत्र में भारत की आत्मनिर्भरता (Atmanirbhar Bharat) की नई रणनीति ने इस बात पर मुहर लगा दी है कि तीन दशकों के शोध और प्रयासों से विकसित हुई यह स्वदेशी तकनीक अब भारत के भविष्य के रक्षा कार्यक्रमों का मुख्य आधार बनेगी।
1. 5वीं पीढ़ी से आगे: रक्षा मंत्री की वैज्ञानिकों से बड़ी अपील
बेंगलुरु स्थित DRDO की गैस टर्बाइन रिसर्च एस्टेब्लिशमेंट (GTRE) प्रयोगशाला के दौरे के दौरान रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने एयरो-इंजन विकास की पारंपरिक समय-सीमा को काफी छोटा करने का आह्वान किया।
“उन्नत और विकसित देशों को नया फाइटर जेट इंजन विकसित करने में 25 से 30 साल लगते हैं। हमें यह मानकर चलना होगा कि 20 साल बीत चुके हैं और अब हमारे पास केवल 5 से 7 साल बचे हैं। हमें सीधे 5वीं पीढ़ी से आगे बढ़कर छठी पीढ़ी (6th Generation) के इंजनों पर काम करना होगा, जिसमें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), मशीन लर्निंग (ML) और अत्याधुनिक मिश्रित सामग्रियों का उपयोग हो।”
— राजनाथ सिंह, रक्षा मंत्री
इसी यात्रा के दौरान उन्होंने कावेरी इंजन के अपग्रेडेड फुल-आफ्टरबर्नर का सफल परीक्षण भी देखा। ब्रह्मोस एयरोस्पेस के सहयोग से तैयार यह नया कॉन्फिगरेशन 81 से 83 किलोन्यूटन (kN) थ्रस्ट पैदा करने में सक्षम है।
2. कावेरी 1.0 से ‘कावेरी 2.0’ तक का उतार-चढ़ाव भरा सफर
भारत सरकार ने 1989 में 382 करोड़ रुपये की लागत से तेजस फाइटर के लिए स्वदेशी टर्बोफैन कावेरी इंजन (GTX-35VS) प्रोजेक्ट को मंजूरी दी थी। हालांकि, शुरुआती दौर में कई तकनीकी और परिस्थितिजन्य कमियों के कारण इसे 2008 में तेजस प्रोजेक्ट से आधिकारिक रूप से अलग कर दिया गया था:
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शुरुआती चुनौतियां: वायु सेना को 83-85 kN थ्रस्ट की आवश्यकता थी, जबकि मूल कावेरी केवल 70-72 kN थ्रस्ट ही दे सका। इसके अलावा यह डिजाइन लक्ष्य से 150 किग्रा भारी था और इसके टर्बाइन ब्लेड्स व कंट्रोल सिस्टम में तकनीकी कमियां थीं।
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प्रतिबंध और सुविधाओं का अभाव: 1998 के परमाणु परीक्षणों के बाद लगे अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों और भारत में हाई-ऑल्टिट्यूड (अधिक ऊंचाई) परीक्षण सुविधा न होने से काम प्रभावित हुआ।
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कावेरी का नया अवतार (Kaveri 2.0):
तेजस से हटने के बाद भी इस प्रोजेक्ट को बंद नहीं किया गया। इसके तहत तीन प्रमुख उन्नत प्रारूप तैयार किए गए हैं:
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ड्राई कावेरी (Kaveri Derivative Engine): बिना आफ्टरबर्नर वाला यह इंजन 49-51 kN थ्रस्ट देता है। इसका उपयोग भारत के ‘घातक’ (Ghatak) स्टेल्थ कॉम्बैट ड्रोन को संचालित करने के लिए किया जा रहा है। रूस में इसका हाई-ऑल्टिट्यूड टेस्ट सफलतापूर्वक पूरा हो चुका है।
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कावेरी 2.0: यह कावेरी का अपग्रेडेड आफ्टरबर्निंग वर्जन है, जो 81-83 kN का दमदार थ्रस्ट देता है।
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कावेरी मरीन गैस टर्बाइन (KMG T): नौसेना के लिए विकसित इस मरीन इंजन ने विशाखापत्तनम में सफल परीक्षणों के दौरान 12 मेगावाट (लगभग 16,000 हॉर्सपावर) की प्रणोदन शक्ति (Propulsion Power) उत्पन्न की है।
3. विदेशी इंजनों पर निर्भरता और रणनीतिक जोखिम
दशकों के निवेश के बाद भी भारतीय वायु सेना (IAF) और नौसेना का फ्रंटलाइन बेड़ा अमेरिकी कंपनी जनरल इलेक्ट्रिक (GE) के इंजनों पर अत्यधिक निर्भर है:
| विमान / युद्धपोत का नाम | वर्तमान में प्रयुक्त अमेरिकी इंजन (GE Powerplant) |
| तेजस Mk-1 एवं Mk-1A | GE F404-IN20 इंजन |
| तेजस Mk-2 एवं AMCA (शुरुआती मॉडल) | अधिक शक्तिशाली GE F414 इंजन |
| P-8I समुद्री गश्ती विमान, MH-60R व अपाचे | जनरल इलेक्ट्रिक टर्बोशाफ्ट / टर्बोफैन इंजन |
| INS विक्रांत एवं शिवालिक श्रेणी युद्धपोत | LM2500 मरीन गैस टर्बाइन इंजन |
हाल ही में अमेरिका से F404 इंजनों की आपूर्ति में एक साल से अधिक की देरी होने के कारण हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) को तेजस विमानों का उत्पादन धीमा करना पड़ा। इस घटनाक्रम ने विदेशी आपूर्ति श्रृंखलाओं पर निर्भर रहने के बड़े जोखिमों को पूरी तरह उजागर कर दिया है।
4. AMCA और ‘राष्ट्रीय एयरो इंजन मिशन’ से जगी नई उम्मीदें
भारत के 5वीं पीढ़ी के स्टेल्थ फाइटर जेट AMCA (Advanced Medium Combat Aircraft) के शुरुआती प्रोटोटाइप भले ही अमेरिकी GE F414 इंजनों से उड़ान भरेंगे, लेकिन सरकार का अंतिम लक्ष्य इसे पूरी तरह से स्वदेशी इंजन से लैस करना है।
इसी दिशा में सरकार ने ‘राष्ट्रीय एयरो इंजन मिशन’ (National Aero Engine Mission) की शुरुआत की है। इस दूरदर्शी पहल का उद्देश्य भारतीय उद्योगों, DRDO, शैक्षणिक अनुसंधान संस्थानों और विदेशी प्रौद्योगिकी साझेदारों को एक मंच पर लाकर अगली पीढ़ी के सैन्य जेट इंजनों का स्वदेशी विनिर्माण सुनिश्चित करना है। भले ही मूल कावेरी इंजन सीधे तेजस को ताकत न दे पाया हो, लेकिन इसके माध्यम से हासिल की गई धातुकर्म (Metallurgy), डिजिटल इंजन कंट्रोल और टर्बाइन डिजाइन की क्षमताएं भविष्य के भारतीय जेट इंजनों की मजबूत नींव बन चुकी हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
Q1. कावेरी इंजन को मूल रूप से तेजस लड़ाकू विमान से क्यों हटाया गया था?
उत्तर: मूल कावेरी इंजन वायु सेना की 83-85 kN थ्रस्ट की आवश्यकता के मुकाबले केवल 70-72 kN थ्रस्ट ही बना सका था। साथ ही यह तय वजन से 150 किलो भारी था और इसके कंट्रोल सिस्टम में तकनीकी कमियां थीं।
Q2. ‘ड्राई कावेरी’ इंजन का उपयोग किस सैन्य प्रोजेक्ट में किया जा रहा है?
उत्तर: ‘ड्राई कावेरी’ (बिना आफ्टरबर्नर वाला इंजन) 49-51 kN थ्रस्ट उत्पन्न करता है और इसका उपयोग DRDO के ‘घातक’ स्वदेशी स्टेल्थ मानव रहित लड़ाकू विमान (UAV/Stealth Drone) को शक्ति प्रदान करने के लिए किया जा रहा है।
Q3. ‘राष्ट्रीय एयरो इंजन मिशन’ का मुख्य उद्देश्य क्या है?
उत्तर: इस मिशन का मुख्य उद्देश्य भारतीय उद्योगों, DRDO और वैश्विक प्रौद्योगिकी साझेदारों को एक साथ लाकर भविष्य के लड़ाकू विमानों (जैसे AMCA) के लिए 110 kN या उससे अधिक थ्रस्ट क्षमता वाले 100% स्वदेशी जेट इंजन विकसित करना है।
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