मंगल, चांद, सूरज और समुद्र… विक्रम-1 की सफल लॉन्चिंग के साथ भारत ने अंतरिक्ष में गाड़े झंडे
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भारत आज अंतरिक्ष विज्ञान और अत्याधुनिक तकनीक के मामले में दुनिया के अग्रणी देशों की कतार में सबसे आगे खड़ा है। मंगल और चंद्रमा पर सफल अंतरिक्ष यान भेजने और सैकड़ों उपग्रहों को उनकी सटीक कक्षा में स्थापित करने के बाद, देश ने अब अपना पहला निजी तौर पर विकसित ऑर्बिटल-क्लास रॉकेट ‘विक्रम-1’ सफलतापूर्वक लॉन्च कर दिया है भारत ने मंगल और चंद्रमा पर अंतरिक्ष यान भेजे हैं, सैकड़ों उपग्रहों को कक्षा में स्थापित किया है और अब अपना पहला निजी तौर पर विकसित ऑर्बिटल-क्लास रॉकेट विक्रम-1 लॉन्च कर दिया है।
वर्तमान में भारत की स्पेस इकॉनमी लगभग 8.4 अरब डॉलर तक पहुँच चुकी है। साल 2020 में जब से इस क्षेत्र को निजी निवेश (Private Investment) के लिए खोला गया है, तब से इसमें एक अभूतपूर्व तेजी आई है और अब तक 400 से ज्यादा नए स्पेस स्टार्टअप्स इस क्षेत्र से जुड़ चुके हैं 2020 में इस सेक्टर के लिए प्राइवेट इन्वेस्टमेंट खुलने के बाद से ये तेजी से बढ़ी है और इसने 400 से ज्यादा स्पेस स्टार्टअप्स को आकर्षित किया है।
स्काईरूट एयरोस्पेस द्वारा विकसित यह रॉकेट भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) और निजी क्षेत्र के बीच बढ़ते शानदार तालमेल का एक बेहतरीन उदाहरण है भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) के साथ मिलकर काम करने वाली कई प्रमुख सरकारी और निजी कंपनियां रक्षा क्षेत्र में भी काम करती हैं, जिससे अंतरिक्ष और सुरक्षा के बीच का दायरा आपस में जुड़ता जा रहा है। अब देश के पहले प्राइवेट तौर पर विकसित ऑर्बिटल-क्लास रॉकेट लॉन्च करने का स्काईरूट एयरोस्पेस तेजी से बढ़ते भारतीय स्पेस इंडस्ट्री के लिए अगला बड़ा कदम है।
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1. चांद से लेकर सूर्य और शुक्र तक का महा-विज़न
अंतरिक्ष विभाग के अनुसार, भारत आज केवल उपग्रह छोड़ने तक सीमित नहीं है, बल्कि डीप-स्पेस एक्सप्लोरेशन (गहरे अंतरिक्ष की खोज), मानव अंतरिक्ष उड़ान और ऑर्बिटल इंफ्रास्ट्रक्चर जैसे बड़े लक्ष्यों पर काम कर रहा है अंतरिक्ष विभाग ने कहा, “भारत डीप-स्पेस एक्सप्लोरेशन, अंतरिक्ष विज्ञान, मानव अंतरिक्ष उड़ान और ऑर्बिटल इंफ्रास्ट्रक्चर के क्षेत्रों में बड़े लक्ष्य हासिल करने की दिशा में काम कर रहा है।]। भारत के इन बड़े मिशनों की रूपरेखा इस प्रकार है:
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चंद्रयान की सफलता: साल 2014 में मंगल की कक्षा में पहुंचने वाला पहला एशियाई देश बनने के बाद भारत ने अपने चंद्र मिशन (चंद्रयान) में बड़ी सफलता पाई. वर्ष 2023 के सफल तीसरे चंद्रयान मिशन ने रोवर को चांद पर उतारकर भारत को रूस, अमेरिका और चीन के बाद दुनिया का चौथा सफल देश बना दिया इस प्रोग्राम में 2008 का लूनर ऑर्बिटर, 2019 में लैंडिंग की नाकाम कोशिश और 2023 का सफल मिशन शामिल था, जिसमें एक रोवर को तैनात किया गया था। इस रोवर मिशन ने भारत को रूस, अमेरिका और चीन के बाद चंद्रमा पर बिना इंसानों वाला यान उतारने वाला चौथा देश बना दिया।
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आगामी चंद्रयान और शुक्र मिशन: वर्ष 2027 के लिए तय चौथे चंद्र मिशन के जरिए चांद की सतह से मिट्टी के सैंपल वापस धरती पर लाने की तैयारी है. इसके ठीक बाद, वर्ष 2028 में शुक्र ग्रह (Venus) की कक्षा में जाने वाले एक विशेष मिशन की योजना तय की गई है.
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आदित्य मिशन: सूर्य का अध्ययन करने के लिए भेजा गया ‘आदित्य’ मिशन इस समय सूर्य की सबसे बाहरी परतों और अंतरिक्ष के बदलते मौसम पर लगातार नजर रख रहा है सूर्य का अध्ययन करने वाला मिशन ‘आदित्य’ सूर्य की सबसे बाहरी परतों और अंतरिक्ष के मौसम पर नजर रख रहा है।
2. अंतरिक्ष से समुद्र की गहराइयों तक: ‘मत्स्य’ पनडुब्बी का मिशन
इसरो की अत्याधुनिक स्वदेशी तकनीक का लाभ केवल आसमान को ही नहीं, बल्कि समुद्र की गहराइयों को नापने में भी मिल रहा है। भगवान विष्णु के पहले अवतार के नाम पर भारत की विशेष ‘मत्स्य’ पनडुब्बी को विकसित किया जा रहा है पृथ्वी पर इसरो की टेक्नोलॉजी भारत की ‘मत्स्य’ पनडुब्बी को विकसित करने में मदद कर रही है, जिसका नाम हिंदू देवता विष्णु के मत्स्य अवतार के नाम पर रखा गया है।
साइंस मिनिस्टर जितेंद्र सिंह के मुताबिक, वर्ष 2027 तक यह पनडुब्बी भारतीय वैज्ञानिकों को समुद्र की सतह से छह किलोमीटर (3.7 मील) नीचे लेकर जाएगी साइंस मिनिस्टर जितेंद्र सिंह के अनुसार, 2027 तक यह वैज्ञानिकों को समुद्र में छह किलोमीटर (3.7 मील) नीचे ले जाएगा]. इसका मुख्य उद्देश्य गहरे समुद्र के छिपे हुए संसाधनों, दुर्लभ तत्वों (Rare Earth) और जरूरी मिनरल्स का पता लगाना तथा उनका सही उपयोग करना है.
3. कमर्शियल सैटेलाइट मार्केट और स्पेसपोर्ट का विस्तार
वर्ष 1975 में सोवियत संघ के रॉकेट की मदद से अपना पहला सैटेलाइट लॉन्च करने वाला भारत आज दुनिया में सबसे कम लागत वाले सफल मिशनों के लिए जाना जाता है. वर्ष 2014 के बाद से इस स्पेस प्रोग्राम में जबरदस्त तेजी आई है:
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विदेशी सैटेलाइट्स से कमाई: इसरो ने अब तक 430 से अधिक विदेशी उपग्रहों को सफलतापूर्वक अंतरिक्ष में स्थापित कर 600 मिलियन डॉलर से ज्यादा की विदेशी मुद्रा अर्जित की है. इसके साथ ही भारत के अपने 144 से ज्यादा सैटेलाइट भी अंतरिक्ष में काम कर रहे हैं.
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नए स्पेसपोर्ट का निर्माण: आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा में मौजूद लॉन्चपैड के विस्तार के साथ ही अब तमिलनाडु के कुलसेकरपट्टिनम में देश का दूसरा नया स्पेसपोर्ट (लॉन्चिंग स्टेशन) तेजी से तैयार किया जा रहा है भारत अब आंध्र प्रदेश के दक्षिण-पूर्वी तट पर श्रीहरिकोटा में अपने लॉन्चपैड का विस्तार कर रहा है और भारत के दक्षिणी सिरे पर तमिलनाडु के कुलसेकरपट्टिनम में एक दूसरा स्पेसपोर्ट बनाया जा रहा है।
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भविष्य का लक्ष्य: सरकार का अनुमान है कि भारत का यह स्पेस उद्योग वर्ष 2033 तक 44 बिलियन डॉलर और वर्ष 2040 तक बढ़कर 100 बिलियन डॉलर के विशाल स्तर को छू लेगा.
वर्तमान में भारत नासा (NASA), यूरोपियन स्पेस एजेंसी (ESA) सहित फ्रांस, जर्मनी, इटली, जापान और सऊदी अरब के साथ मिलकर काम कर रहा है.
4. प्राइवेट प्लेयर्स और मिलिट्री-डिफेंस का तगड़ा तालमेल
भारत का सिविल स्पेस और देश का डिफेंस (रक्षा) सेक्टर आज आपस में गहराई से जुड़ चुके हैं. रॉकेट प्रोपल्शन, सैटेलाइट इलेक्ट्रॉनिक्स और गाइडेंस सिस्टम जैसी तकनीकों का इस्तेमाल हमारे मिसाइल और मिलिट्री ड्रोन प्रोग्राम में बड़े पैमाने पर हो रहा है इनमें लॉन्च रॉकेट, प्रोपल्शन, सैटेलाइट, इलेक्ट्रॉनिक्स और गाइडेंस सिस्टम शामिल हैं।
ये ऐसी टेक्नोलॉजी है जिसका इस्तेमाल स्पेस और भारत के बढ़ते मिसाइल और मिलिट्री ड्रोन प्रोग्राम में होता है। इसरो का रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) और भारत-रूस के संयुक्त उपक्रम ‘ब्रह्मोस मिसाइल’ के साथ एक बहुत ही सक्रिय व करीबी तालमेल है इसरो ने सरकार के डिफेंस रिसर्च एंड डेवलपमेंट ऑर्गनाइजेशन (DRDO) के साथ सक्रिय तालमेल की तारीफ की है और भारत-रूस के जॉइंट वेंचर, ब्रह्मोस मिसाइल प्रोग्राम के साथ भी उसके करीबी संबंध रहे हैं।].
प्रमुख प्राइवेट कंपनियां और उनके कार्य:
| कंपनी का नाम | मुख्य कार्य और विशेषज्ञता |
| स्काईरूट एयरोस्पेस | छोटे सैटेलाइट्स को पृथ्वी की निचली कक्षा (LEO) में ले जाने वाले ‘विक्रम-1’ रॉकेट का निर्माण इस क्षेत्र की प्रमुख कंपनियों में स्काईरूट एयरोस्पेस भी शामिल है। विक्रम-1 रॉकेट को छोटे सैटेलाइट्स को लो-अर्थ ऑर्बिट (पृथ्वी की निचली कक्षा) में ले जाने के लिए डिजाइन किया गया है। |
| पिक्सेल (Pixxel) | कृषि और पर्यावरण की बारीक निगरानी के लिए अत्याधुनिक ऑब्जर्वेशन सैटेलाइट्स का विकास. |
| बेलाट्रिक्स एयरोस्पेस | सैटेलाइट्स के लिए आधुनिक और कुशल प्रोपल्शन सिस्टम का निर्माण. |
| अग्निकुल कॉस्मॉस | 3D-प्रिंटेड रॉकेट इंजन से लैस छोटे सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल्स का विकास और Agnikul Cosmos 3D-प्रिंटेड रॉकेट इंजन से चलने वाले छोटे सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल बना रही है। |
5. ‘गगनयान’: भारत का पहला ऐतिहासिक मानव अंतरिक्ष मिशन
इंसानों को अंतरिक्ष में भेजने के भारत के इस सबसे बड़े और महत्वाकांक्षी अभियान ‘गगनयान’ में रूस तकनीकी रूप से मदद कर रहा है. इस मिशन के तहत तीन भारतीय अंतरिक्ष यात्रियों को 400 किलोमीटर ऊपर की कक्षा में तीन दिनों के लिए भेजने का लक्ष्य है.
इस मुख्य उड़ान से पहले, बिना क्रू (इंसान) वाले तीन टेस्ट रन में से पहला टेस्ट 2026 के आखिर तक होने की पूरी उम्मीद है. इसी तैयारी के तहत भारतीय वायु सेना के जांबाज पायलट शुभांशु शुक्ला ने स्पेसएक्स ड्रैगन अंतरिक्ष यान के जरिए इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन पहुंचकर इतिहास रचा था तैयारियों के हिस्से के तौर पर भारतीय वायु सेना के पायलट शुभांशु शुक्ला 2025 में स्पेसएक्स ड्रैगन अंतरिक्ष यान से जुड़े और इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन पहुंचने वाले पहले भारतीय बने।
भविष्य का रोडमैप: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्पष्ट रूप से घोषणा की है कि वर्ष 2035 तक अंतरिक्ष में भारत का अपना खुद का ‘स्पेस स्टेशन’ स्थापित होगा और वर्ष 2040 तक भारत का कोई अंतरिक्ष यात्री सीधे चंद्रमा की सतह पर कदम रखेगा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा है कि 2035 तक भारत का अपना स्पेस स्टेशन होगा और 2040 तक चांद पर एक अंतरिक्ष यात्री भेजने की योजना है।
FAQs
Q1. ‘विक्रम-1’ रॉकेट का भारतीय अंतरिक्ष उद्योग में क्या महत्व है?
उत्तर: विक्रम-1 भारत का पहला निजी तौर पर (स्काईरूट एयरोस्पेस द्वारा) विकसित किया गया ऑर्बिटल-क्लास रॉकेट है, जो छोटे सैटेलाइट्स को पृथ्वी की निचली कक्षा में स्थापित करने में भारत को आत्मनिर्भर बनाएगा भारत ने मंगल और चंद्रमा पर अंतरिक्ष यान भेजे हैं, सैकड़ों उपग्रहों को कक्षा में स्थापित किया है और अब अपना पहला निजी तौर पर विकसित ऑर्बिटल-क्लास रॉकेट विक्रम-1 लॉन्च कर दिया है।
Q2. भारत का ‘मत्स्य’ मिशन क्या है और यह कब लॉन्च होगा?
उत्तर: मत्स्य एक विशेष स्वदेशी पनडुब्बी मिशन है, जो वर्ष 2027 तक भारतीय वैज्ञानिकों को समुद्र में 6 किलोमीटर नीचे लेकर जाएगा ताकि दुर्लभ खनिजों और गहरे समुद्र के संसाधनों की खोज की जा सके साइंस मिनिस्टर जितेंद्र सिंह के अनुसार, 2027 तक यह वैज्ञानिकों को समुद्र में छह किलोमीटर (3.7 मील) नीचे ले जाएगा, ताकि ‘गहरे समुद्र के संसाधनों’ (जिनमें रेयर earth और जरूरी मिनरल शामिल हैं) का इस्तेमाल किया जा सके।
Q3. गगनयान मिशन का पहला बिना क्रू वाला टेस्ट रन कब होने की उम्मीद है?
उत्तर: गगनयान मिशन के तीन नियोजित बिना क्रू वाले टेस्ट में से पहला टेस्ट रन वर्ष 2026 के आखिर तक होने की पूरी संभावना है.
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