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चीन की घेरेबंदी: भारत और ऑस्ट्रेलिया का वो ‘मास्टरस्ट्रोक’ जिसने ड्रैगन की नींद उड़ा दी है

भारत-ऑस्ट्रेलिया के बीच ऐतिहासिक रक्षा समझौता, हिंद-प्रशांत में बना नया 'कवच'

India Australia Defense Pact

अंतरराष्ट्रीय राजनीति में एक कहावत है—’दुश्मन का दुश्मन दोस्त होता है।’ लेकिन जब बात चीन की विस्तारवादी नीतियों और समुद्र में उसकी दादागिरी की हो, तो सिर्फ दोस्ती से काम नहीं चलता; एक ठोस और आक्रामक रणनीति की जरूरत होती है।

हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और ऑस्ट्रेलिया के पीएम एंथनी अल्बनीज के बीच जो तीसरा वार्षिक शिखर सम्मेलन हुआ है, वह ठीक वैसी ही रणनीति का हिस्सा है। देखने में यह एक आम कूटनीतिक मुलाकात लग सकती है, लेकिन अगर आप इसके पन्नों को पलटेंगे, तो समझ आएगा कि भारत और ऑस्ट्रेलिया ने मिलकर हिंद-प्रशांत क्षेत्र (Indo-Pacific) में चीन को घेरने का एक तगड़ा ‘रणनीतिक कवच’ तैयार कर लिया है।

आइए, आसान भाषा में समझते हैं कि इस समझौते में ऐसा क्या है जिसने चीन की टेंशन बढ़ा दी है।

1. समुद्र में एक-दूसरे के अड्डों का इस्तेमाल (सबसे बड़ा दांव)

चीन लंबे समय से ‘स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स’ (मोतियों की माला) नीति के तहत भारत को समुद्र में घेरने की कोशिश कर रहा है। इसके जवाब में भारत और ऑस्ट्रेलिया ने तय किया है कि अब दोनों देशों की नौसेनाएं एक-दूसरे के सैन्य अड्डों और बंदरगाहों का इस्तेमाल कर सकेंगी।

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अब जरा इसका मतलब समझिए—अगर भारतीय नौसेना का कोई जहाज दक्षिण प्रशांत क्षेत्र (चीन के प्रभाव वाले इलाके) में है, तो उसे ईंधन या मरम्मत के लिए वापस भारत नहीं आना पड़ेगा; वह सीधे ऑस्ट्रेलिया के बंदरगाह पर रुक सकता है। ठीक इसी तरह, ऑस्ट्रेलियाई सेना मलक्का जलडमरूमध्य (जहां से चीन का सबसे ज्यादा व्यापार होता है) तक आसानी से पहुंच बना सकेगी। यह चीन के लिए एक सीधा और कड़ा संदेश है।

2. ‘क्रिटिकल मिनरल्स’ पर चीन का एकाधिकार टूटेगा

आज आप जो स्मार्टफोन इस्तेमाल कर रहे हैं, या जो इलेक्ट्रिक गाड़ियां (EVs) सड़कों पर दौड़ रही हैं, उनकी बैटरियां लिथियम और कोबाल्ट जैसे खनिजों (Critical Minerals) से बनती हैं। फिलहाल दुनिया भर में इन खनिजों की सप्लाई पर चीन का एकतरफा कब्जा है। इस मजबूरी को खत्म करने के लिए भारत और ऑस्ट्रेलिया ने एक ‘क्रिटिकल मिनरल्स कॉरिडोर’ बनाने का फैसला किया है। ऑस्ट्रेलिया के पास इन खनिजों का अथाह भंडार है। अब वह भारत को सीधे इनकी सप्लाई करेगा, जिससे हम चीन पर निर्भर नहीं रहेंगे।

3. शिक्षा और छात्रों के लिए गुड न्यूज़

अगर आप या आपके बच्चे विदेश जाकर पढ़ने का सपना देखते हैं, तो यह खबर आपके लिए है। भारत सरकार ने ऑस्ट्रेलिया की दो बड़ी यूनिवर्सिटीज को सीधे भारत में अपने कैंपस खोलने की हरी झंडी दे दी है:

  • फ्लिंडर्स यूनिवर्सिटी: यह अपना इंटरनेशनल कैंपस आईटी हब बेंगलुरु में खोलेगी।

  • विक्टोरिया यूनिवर्सिटी: इसका कैंपस दिल्ली से सटे गुरुग्राम (गुड़गांव) में खुलेगा। यानी अब विदेशी डिग्री के लिए लाखों रुपये खर्च करके ऑस्ट्रेलिया जाने की जरूरत नहीं, पढ़ाई यहीं हो जाएगी।

4. भारत लौट रही हैं हमारी तीन प्राचीन धरोहरें

भारत की सांस्कृतिक विरासत को सहेजने के लिए भी एक शानदार कदम उठाया गया है। ऑस्ट्रेलिया भारत से चोरी या तस्करी होकर गईं 11वीं और 12वीं सदी की तीन प्राचीन मूर्तियां हमें वापस लौटा रहा है। इनमें भगवान शिव के वाहन नंदी की ग्रेनाइट की मूर्ति, त्रिशूलधारी भद्रकाली की कांस्य प्रतिमा और भगवान कार्तिकेय (स्कंद) की छह मुख वाली पत्थर की मूर्ति शामिल है।

5. खेलों की दुनिया में लंबी छलांग की तैयारी

भारत की नजर अब 2030 में अहमदाबाद में होने वाले राष्ट्रमंडल खेलों (Commonwealth Games) और 2032 में ऑस्ट्रेलिया के ब्रिस्बेन में होने वाले ओलंपिक पर है। इसके लिए दोनों देशों ने स्पोर्ट्स कोलैबोरेशन रोडमैप तैयार किया है। इससे न सिर्फ हमारे खिलाड़ियों को बेहतर ट्रेनिंग मिलेगी, बल्कि स्पोर्ट्स इंफ्रास्ट्रक्चर और टूरिज्म को भी पंख लगेंगे।

6. आतंकवाद और सेना की ट्रेनिंग

दुनिया भर में फैल रहे आतंकवाद पर भी दोनों देशों ने जीरो-टॉलरेंस की नीति अपनाई है। इसके साथ ही, सैन्य कूटनीति के तहत एक दिलचस्प फैसला यह हुआ है कि 2028-29 में भारत का एक सैन्य अधिकारी (Instructor) ऑस्ट्रेलियाई डिफेंस कॉलेज में नियुक्त किया जाएगा।

कुल मिलाकर कहें तो… यह समझौता सिर्फ दो देशों के बीच व्यापार या कूटनीति की बातें नहीं है। यह चीन की उस मानसिकता पर एक कड़ा प्रहार है जो सोचता है कि वह एशिया में अपनी मनमानी कर सकता है। भारत और ऑस्ट्रेलिया ने साफ कर दिया है कि वे हिंद-प्रशांत क्षेत्र को किसी एक देश की जागीर नहीं बनने देंगे।

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