
Kamakhya Temple History
असम के गुवाहाटी में नीलांचल पर्वत की पहाड़ियों पर एक ऐसा मंदिर मौजूद है, जिसके बारे में सुनने के बाद कोई भी हैरान रह जाए। बचपन से हम सबने मंदिरों में भगवान की मूर्तियों की पूजा होते देखी है, लेकिन जब मैंने कामाख्या शक्तिपीठ के बारे में जाना, तो धर्म और आस्था को लेकर मेरा नज़रिया ही बदल गया।
यह भारत के 51 शक्तिपीठों में सबसे प्रमुख है, लेकिन मजे की बात यह है कि यहां कोई पारंपरिक मूर्ति नहीं है। यहां उस शक्ति की पूजा होती है, जिससे यह पूरी सृष्टि बनी है।
बिना मूर्ति का मंदिर: आखिर यहां पूजा किसकी होती है?
अगर आपने शिव पुराण की कथाएं पढ़ी हैं, तो आपको याद होगा कि जब भगवान शिव माता सती के शरीर को लेकर ब्रह्मांड में भटक रहे थे, तब भगवान विष्णु ने अपने चक्र से सती की देह के हिस्से किए थे। मान्यता है कि नीलांचल पर्वत के इसी हिस्से पर माता सती का ‘सृजन अंग’ (गर्भाशय) गिरा था।
इसलिए इस मंदिर के गर्भगृह में कोई मूर्ति नहीं है। इसके बजाय, वहां एक प्राकृतिक समतल चट्टान है जहां से हमेशा एक झरने का जल बहता रहता है। इसी स्थान को देवी का स्वरूप मानकर फूलों और रेशमी कपड़ों से सजाकर पूजा जाता है। यह सोचकर ही रोंगटे खड़े हो जाते हैं कि हमारी प्राचीन संस्कृति कितनी वैज्ञानिक और गहरी है!
अंबूबाची मेला: जब लाल हो जाता है माता का वस्त्र
इस मंदिर से जुड़ी जो बात मुझे सबसे ज्यादा अचरज में डालती है, वह है यहां का ‘अंबूबाची मेला’। आपने अक्सर देखा होगा कि मासिक धर्म (Periods) के दौरान महिलाओं को मंदिर जाने या पूजा-पाठ करने की मनाही होती है। लेकिन कामाख्या में इसका बिल्कुल उल्टा है!
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हर साल जून के महीने में तीन दिनों के लिए मंदिर के कपाट पूरी तरह बंद कर दिए जाते हैं। स्थानीय लोगों और पुजारियों का मानना है कि इन तीन दिनों में माता रजस्वला अवस्था (मासिक धर्म) में होती हैं। सोचिए, जिस प्राकृतिक चक्र को समाज कई बार अशुद्ध मानकर छुपाता है, कामाख्या में उसी का जश्न मनाया जाता है। जब चौथे दिन मंदिर खुलता है, तो भक्तों को प्रसाद के रूप में एक लाल रंग का कपड़ा (अंबूबाची वस्त्र) मिलता है। लोग इसे बहुत पवित्र मानते हैं और अपने पास सहेज कर रखते हैं।
तंत्र-मंत्र और सदियों पुराने श्राप की कहानी
अगर आपको रहस्यों में थोड़ी भी दिलचस्पी है, तो बता दूं कि कामाख्या को ‘तंत्र विद्या’ का गढ़ माना जाता है। देश भर से तांत्रिक और अघोरी साधु अपनी साधना पूरी करने के लिए यहीं आते हैं।
यहां के किस्से भी किसी फैंटेसी कहानी जैसे लगते हैं। कहते हैं कि ‘नरकासुर’ नाम का एक असुर देवी से शादी करना चाहता था। देवी ने शर्त रखी कि अगर वह एक ही रात में पहाड़ के नीचे से मंदिर तक सीढ़ियां बना देगा, तो वो मान जाएंगी। उसने मायावी शक्तियों से लगभग सीढ़ियां बना भी ली थीं, लेकिन देवी ने एक मुर्गे के जरिए सुबह होने से पहले ही बांग दिलवा दी और वो शर्त हार गया। कहते हैं कि वो अधूरी सीढ़ियां आज भी उन जंगलों में मौजूद हैं।
एक और दिलचस्प किस्सा असम के ‘कोच राजवंश’ का है। कहा जाता है कि इस राजघराने के राजा ने देवी के गुप्त रूप को छुपकर देखने की कोशिश की थी, जिससे क्रोधित होकर देवी ने उन्हें श्राप दे दिया। आपको जानकर हैरानी होगी कि इस श्राप के डर से आज भी उस राजवंश का कोई भी सदस्य कामाख्या मंदिर की तरफ देखने की हिम्मत नहीं करता।
समाज के लिए कामाख्या का गहरा संदेश
कामाख्या मंदिर भारतीय संस्कृति में नारी शक्ति और सृजन का एक अनूठा प्रतीक है। जहाँ एक ओर समाज में स्त्री के प्राकृतिक बदलावों (मासिक धर्म) को अशुद्धता से जोड़कर देखा जाता है, वहीं कामाख्या में इसे पवित्र मानकर इसकी पूजा की जाती है।
यह मंदिर आधुनिक समाज को एक बहुत बड़ा संदेश देता है— स्त्री के भीतर ही पूरे ब्रह्मांड के सृजन की शक्ति छिपी है। अगर आप जीवन में आध्यात्म, रहस्य और शांति की तलाश में हैं, तो जीवन में एक बार कामाख्या शक्तिपीठ के दर्शन अवश्य करने चाहिए।
मेरा नजरिया
कामाख्या मंदिर मेरे लिए सिर्फ एक आस्था का केंद्र नहीं है; यह इस बात का एक खूबसूरत प्रतीक है कि स्त्री के शरीर में ही पूरे ब्रह्मांड को जन्म देने की असली ताकत छिपी है। यह मंदिर हमें सिखाता है कि प्रकृति के बनाए नियमों का सम्मान कैसे किया जाना चाहिए।
अगर आप कभी असम जाने का प्लान बनाएं, तो इस रहस्यमयी और गजब की ऊर्जा से भरे शक्तिपीठ के दर्शन जरूर कीजिएगा। यकीन मानिए, वहां का शांत और रहस्यमयी माहौल आपको एक अलग ही दुनिया का अहसास कराएगा।
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