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Konark Surya Mandir
भारत का इतिहास और वास्तुकला रहस्यों से भरी हुई है। इन्हीं रहस्यों में से एक है ओडिशा के पूरी जिले में स्थित कोणार्क का सूर्य मंदिर (Konark Sun Temple)।
यह सिर्फ एक मंदिर नहीं है, बल्कि उस 12 साल के मासूम धर्मपद के बलिदान की गाथा है जिसने 1200 शिल्पकारों की जान बचाने के लिए अपने प्राणों की आहुति दे दी। यह कहानी है उस भव्य मंदिर की, जहाँ कभी भगवान सूर्य की मूर्ति बिना किसी सहारे के हवा में झूला करती थी। लेकिन आखिर ऐसा क्या हुआ कि इस भव्य मंदिर का मुख्य द्वार हमेशा-हमेशा के लिए बंद कर दिया गया? और क्यों इतनी खूबसूरत नक्काशी वाले इस मंदिर में कभी पूजा नहीं की गई?
आइए, कोणार्क सूर्य मंदिर के इतिहास, इसके निर्माण और उन खौफनाक आक्रमणों के बारे में विस्तार से जानते हैं जिन्होंने इस मंदिर को एक खंडहर में तब्दील कर दिया।
कोणार्क सूर्य मंदिर का इतिहास और पौराणिक मान्यता
हिंदू धर्म में सूर्य देव को ब्रह्मांड की आत्मा माना जाता है। वैदिक काल से ही सूर्य देव की आराधना होती आ रही है। कोणार्क मंदिर भी भगवान सूर्य को ही समर्पित है। इसे 13वीं शताब्दी में गंग वंश के प्रतापी राजा नरसिंह देव प्रथम ने बनवाया था।
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इस मंदिर के निर्माण के पीछे एक पौराणिक कथा भी जुड़ी है। सांबा पुराण और भविष्य पुराण के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण के पुत्र सांब को एक बार कुष्ठ रोग (चर्म रोग) का श्राप मिल गया था। नारद मुनि के कहने पर सांब ने कोणार्क के चंद्रभागा नदी के तट पर 12 वर्षों तक सूर्य देव की कठिन तपस्या की। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर सूर्य देव ने उन्हें रोगमुक्त कर दिया। इसी कृतज्ञता के रूप में सांब ने यहाँ सूर्य मंदिर का निर्माण करवाया था।
52 टन के चुंबक और हवा में झूलती मूर्ति का रहस्य
कोणार्क मंदिर को आधुनिक विज्ञान और प्राचीन वास्तुकला का ‘आठवां अजूबा’ कहा जाता है। इस मंदिर की सबसे हैरान करने वाली बात इसकी चुंबकीय शक्ति थी।
हवा में तैरती मूर्ति: मंदिर के शिखर पर एक 52 ट-टन विशाल चुंबकीय पत्थर रखा गया था। मंदिर के निचले हिस्से और दीवारों में लोहे की चादरों का इस्तेमाल हुआ था। इन चुंबकों के सटीक संतुलन (Magnetic Balance) के कारण ही गर्भगृह में भगवान सूर्य की विशाल मूर्ति हवा में तैरती रहती थीथी.
भटक जाते थे समुद्री जहाज: यह मंदिर समुद्र के किनारे स्थित था। कहा जाता है कि मंदिर के शिखर पर लगे विशाल चुंबक की शक्ति इतनी अधिक थी कि समुद्र से गुजरने वाले जहाजों का कंपास (दिशा सूचक यंत्र) काम करना बंद कर देता थाथा,र जहाज मंदिर की तरफ खिंचे चले आते थे।
पुर्तगालियों ने चुराया चुंबक: इस चुंबकीय खिंचाव से परेशान होकर, पुर्तगाली नाविकों ने मंदिर के शिखर से उस बहुमूल्य चुंबकीय पत्थर को हटा दिया और अपने साथ ले गए। चुंबक हटने से मंदिर का संतुलन बिगड़ गया और इसकी दीवारें कमजोर होने लगीं।
12 साल के धर्मपद का महान बलिदान
इस मंदिर को कलिंग वास्तुकला शैली में बनाया गया है। इसे बनाने के लिए मुख्य वास्तुकार ‘बिसु महाराणा’ के नेतृत्व में 1200 शिल्पकारों ने 12 साल तक दिन-रात मेहनत की।
जब मंदिर लगभग बनकर तैयार हो गया, तो इसके शिखर पर मुख्य कलश स्थापित करने में सभी 1200 शिल्पकार नाकाम हो रहे थे। राजा नरसिंह देव ने क्रोधित होकर आदेश दिया कि यदि अगले दिन सुबह तक कलश स्थापित नहीं हुआ, तो सभी 1200 कारीगरों का सिर कलम कर दिया जाएगा।
उसी समय बिसु महाराणा का 12 वर्षीय बेटा ‘धर्मपद’ अपने पिता से मिलने वहां पहुंचा। धर्मपद को वास्तुकला का गहरा ज्ञान था। उसने अपनी सूझबूझ से उस कलश को सही जगह पर स्थापित कर दिया। लेकिन कारीगरों को डर था कि राजा को जब पता चलेगा कि 1200 लोग जो काम नहीं कर पाए, वह एक 12 साल के बच्चे ने कर दिया, तो राजा उन्हें माफ नहीं करेंगे। यह देखकर, उन 1200 शिल्पकारों की जान बचाने के लिए मासूम धर्मपद ने मंदिर के शिखर से चंद्रभागा नदी में छलांग लगाकर अपनी जान दे दी।
दीवारों पर बनी कामुक मूर्तियों का सच
कोणार्क मंदिर को ‘ब्लैक पगोडा’ (Black Pagoda) भी कहा जाता है। मध्य प्रदेश के खजुराहो मंदिर की तरह ही इस मंदिर की बाहरी दीवारों पर भी कामुक (Erotic) मूर्तियां उकेरी गई हैं।
इन मूर्तियों को मंदिर के बाहर बनाने का एक बहुत गहरा आध्यात्मिक संदेश है। यह दर्शाता है कि जब कोई व्यक्ति भगवान के दर्शन के लिए गर्भगृह में प्रवेश करे, तो उसे अपनी सभी सांसारिक इच्छाओं, काम और वासना को मंदिर के बाहर ही छोड़कर जाना चाहिए। प्रवेश द्वार पर बने शेर (अहंकार) और हाथी (धन) की मूर्तियां भी इंसान को घमंड और लालच से दूर रहने का संदेश देती हैं।
काला पहाड़ का खौफनाक आक्रमण और मंदिर का विनाश
कोणार्क मंदिर का विनाश किसी एक दिन में नहीं हुआ। इसके पीछे मुस्लिम आक्रमणकारियों और प्राकृतिक आपदाओं, दोनों का हाथ था।
1508 ईस्वी में बंगाल के सुल्तान के सेनापति काला पहाड़ (Kalapahad) ने ओडिशा के मंदिरों पर भयानक आक्रमण किया। जब उसने कोणार्क में सूर्य देव की हवा में झूलती मूर्ति देखी, तो वह हैरान रह गया। मंदिर की 20 से 25 फीट मोटी दीवारों को तोड़ना आसान नहीं था। इसलिए उसने मंदिर के संतुलन को बनाए रखने वाले मुख्य पत्थरों (Key stones) को उखाड़ फेंका।
जैसे ही मुख्य पत्थर हटे, 200 फीट ऊंचा मुख्य टावर भरभरा कर गिर गया। काला पहाड़ ने भगवान सूर्य की मूर्ति को खंडित कर दिया और मंदिर को बुरी तरह लूटकर एक खंडहर में बदल दिया। इसके अलावाअलावा,प और चंद्रभागा नदी के सूखने जैसी प्राकृतिक आपदाओं ने भी इस मंदिर को भारी नुकसान पहुंचाया।
108 सालों से क्यों सील है मुख्य मंडप का दरवाजा?
आज हम कोणार्क मंदिर का जो हिस्सा देखते हैं, वह असल में मुख्य मंदिर का सिर्फ एक छोटा सा हिस्सा (जगमोहन या मुखशाला) है। मुख्य मंदिर सदियों पहले ही नष्ट हो चुका था।
19वीं शताब्दी के अंत में जब भारत पर अंग्रेजों का शासन था, तब 1901 में तत्कालीन ब्रिटिश गवर्नर जनरल जॉन वुडबर्न ने इस मंदिर को पूरी तरह से गिरने से बचाने का फैसला लिया। मंदिर के बचे हुए ढांचे (मंडप) की दीवारें अंदर से कमजोर हो चुकी थीं और गिरने की कगार पर थीं। इसलिए, ब्रिटिश अधिकारियों ने इसके अंदर पूरी तरह से रेत (Sand) भरवा दी ताकि दीवारों को अंदर से सहारा मिल सके और इसके सभी दरवाजों को हमेशा के लिए सील कर दिया।
आज 108 साल से भी ज्यादा समय बीत चुका है, लेकिन वह दरवाजा आज भी बंद है। हालांकि इसे खोलने और रेत बाहर निकालने को लेकर कई बार चर्चाएं हुई हैं, लेकिन ढांचे के गिरने के डर से आज तक किसी ने भी इस दरवाजे को खोलने की हिम्मत नहीं की है।
निष्कर्ष
कोणार्क का सूर्य मंदिर आज भले ही एक अधूरा खंडहर नजर आता हो, लेकिन इसकी भव्यता और वास्तुकला आज भी दुनिया को हैरान करती है। यही कारण है कि यूनेस्को (UNESCO) ने इसे विश्व धरोहर (World Heritage Site) घोषित किया है। यह मंदिर इस बात का जीता-जागता प्रमाण है कि प्राचीन भारत का विज्ञान और वास्तुकला अपने समय से सदियों आगे थी।
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