
Konark mandir ka rahasya
एक गाथा है उस 12 साल के मासूम धर्मपद की जिसने 1200 लोगों की जान बचाने के लिए अपने प्राणों की आहुति दे दी। यह कहानी है उस भव्य मंदिर की जहां सूर्य देव की मूर्ति हवा में झूला करती थी। यह कहानी है एक ऐसे श्रापित कोणार्क मंदिर की जहां कभी पूजा ना की जा सकी।
आखिर कौन सी घटना घटी थी उस समय जिसने इस कोणार्क मंदिर को एक श्रापित मंदिर बना दिया? यह गाथा है उस कोणार्क मंदिर की जिसे एक नहीं, तीन-तीन बार ध्वस्त किया गया। क्या आप जानते हैं एक ऐसे मंदिर के बारे में जिसकी दीवारों पर बनी कामुक मूर्तियां बहुत कुछ बयां करती हैं? क्या आपको यह पता है कि अभी हमें जो कोणार्क मंदिर दिखाई देता है, वह असल में ऐसा नहीं हुआ करता था?
क्या आप यह जानते हैं? आक्रमणकारियों के आक्रमण के बाद पूरी तरह से खत्म हो जाने के बाद वर्षों तक रेत और जंगल से घिर जाने के बाद इस मंदिर को किसने और कैसे खोज निकाला? क्या सच में कोणार्क मंदिर की चुंबकीय शक्ति इतनी मजबूत थी कि समुद्र से गुजरते जहाज भी अपनी दिशा खो दें? आखिर कोणार्क मंदिर के गुंबद पर लगाया गया विशेष चुंबक से निर्मित पत्थर कहां से लाया गया था? आखिर ऐसी भी क्या मजबूरी थी जिसने इस मंदिर के दरवाजे को हमेशा हमेशा के लिए बंद करवा दिया? यह वो मंदिर है जिसकी हर दीवार और हर कोने में एक गहरा रहस्य छिपा है।
आज हम आपको बताएंगे कि कोणार्क मंदिर के खंडहर होने के पीछे की चुप्पी के पीछे काला पहाड़ का आक्रमण है या फिर एक ऐसा रहस्य है जिसे हम अब तक नहीं जान पाए हैं जो हमसे छुपा लिया गया। आज हम आपको कोणार्क के कोने-कोने में दबे उस हर एक रहस्य को बताएंगे जिन्हें आपने आज से पहले कभी नहीं सुना होगा। हमारा देश भारत रहस्यों से भरा हुआ है।
यहां कदम-कदम पर ऐसी जानकारियां मिलती हैं जिन्हें जानकर यकीन करना थोड़ा मुश्किल हो जाता है। इसके साथ ही हमारे देश में ऐसे कई मंदिर हैं जो काफी रहस्यमय हैं। इसी कारण हमारा देश एक हिस्टोरिकल देश माना जाता है जहां पर अनेकों टूरिस्ट प्लेसेस हैं जो हमारे देश के मजबूत इतिहास को बयां करते हैं।
वैसे यह तो अब पूरी दुनिया जानती है कि भारत देश के लोग सदियों से धार्मिक रहे हैं, जिसके कारण भारत में अनेकों धार्मिक टूरिस्ट प्लेसेस देखने को मिलते हैं, जिनका स्ट्रक्चर और नक्काशी लोगों को खूब अट्रैक्ट करती हैं। ऐसे ही देश के कई धार्मिक टूरिस्ट प्लेसेस में से एक कोणार्क का सूर्य मंदिर है, जिसके यूनिक स्ट्रक्चर और इसकी भव्यता के कारण हर दिन कोणार्क मंदिर देखने के लिए हजारों की संख्या में लोग देश-विदेश से यहां आते हैं, जो कि भगवान सूर्य का मंदिर है।
यह मंदिर उड़ीसा की राजधानी भुवनेश्वर में मौजूद है, जिसे मंदिरों की नगरी भी कहा जाता है। जिसकी सबसे खास बातों में से एक खास बात यह है कि अगर आप कभी उड़ीसा गए और यहां के सबसे खूबसूरत मंदिर, यानी कि कोणार्क सूर्य मंदिर को नहीं देखा, तो मानो आपकी उड़ीसा यात्रा अधूरी है। क्योंकि यह खूबसूरत कोणार्क सूर्य मंदिर भगवान सूर्यदेव को समर्पित है, और यह मंदिर उड़िया आर्किटेक्चर का एक शानदार नमूना है।
आज के इस वीडियो में हम आपको कोणार्क मंदिर से जुड़े सभी रहस्यों और इतिहास के बारे में सभी बातें बताने वाले हैं, ताकि आपके दिमाग में कोणार्क मंदिर से रिलेटेड कोई भी डाउट ना रहे। तो चलिए भारत के सबसे रहस्यमई मंदिरों में से एक, कोणार्क सूर्य मंदिर के इतिहास के पन्नों को पलटते हैं।
कोणार्क मंदिर का इतिहास: आपको यह तो पता ही होगा कि हिंदू धर्म में सूर्य देव को बहुत अधिक महत्व दिया जाता है क्योंकि सूर्य के कारण ही धरती पर जीवन है और माना जाता है कि सूर्य देव की आराधना करने से कुंडली के सभी दोष दूर हो जाते हैं। इसीलिए प्राचीन काल से ही सूर्य देव की पूजा-अर्चना की जाती रही है और वैदिक काल से ही कई बड़े-बड़े राजा-महाराजा सूर्य देव की आराधना करते आए हैं और अपनी मनोकामना पूरी होने पर सूर्य देव के लिए वे सूर्य मंदिरों का भी निर्माण कराते आए हैं।
इन्हीं मंदिरों में से एक कोणार्क का सूर्य मंदिर भी है, जो अपनी भव्य संरचना और वास्तुकला के लिए पूरे देश दुनिया में चर्चित है और भारत के प्रमुख सूर्य मंदिरों में से एक है जिसे पूरी तरह से सूर्य भगवान के लिए ही बनाया गया है। इसीलिए इस मंदिर की संरचना भी भगवान सूर्य से जुड़ी कलाकृतियों से जुड़ी हुई है।
इसलिए इस मंदिर का निर्माण इस प्रकार किया गया था कि सूर्य की पहली किरणें पूजा स्थल और भगवान की मूर्ति पर पड़ती हैं, जिसे देखने देश-दुनिया से बड़ी संख्या में श्रद्धालु कोणार्क आते हैं। वैसे, आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि इतने खूबसूरत और attractive कोणार्क मंदिर के निर्माण को लेकर इतिहासकारों में मतभेद रहते हैं, जिनके बारे में कई जानकारों का अपना-अपना मत है, और उनके अनुसार इस मंदिर के निर्माण के बारे में माना जाता है कि इस मंदिर का निर्माण गंग वंश के तत्कालीन सावंत बहादुर और दूरदर्शी राजा लंगुला नरसिंह देव प्रथम ने करवाया था।
और कहा जाता है कि नरसिंह देव प्रथम ने इस मंदिर का निर्माण युद्ध जीतने के बाद भगवान को धन्यवाद करने के लिए उनकी आस्था में करवाया था, जबकि राजा नरसिंह देव प्रथम के युद्ध की कुछ अलग ही रोचक कहानी है, जो कहानी 13वीं शताब्दी में शुरू हुई थी जब 1206 ईसवी में दिल्ली से मोहम्मद गौरी का शासन समाप्त हो चुका था क्योंकि मोहम्मद गौरी की मृत्यु हो गई थी।
उसके बाद उसके गुलाम और सेनापति कुतुबुद्दीन ऐबक ने दिल्ली सल्तनत की स्थापना की और भारत में गुलाम वंश का शासन शुरू हुआ। उसी दौरान, 13वीं शताब्दी में, भारत के अनेकों भागों में दिल्ली सल्तनत का विस्तार हुआ और इन मुस्लिम शासकों ने भारत के उत्तरी-पूर्वी राज्य और बंगाल प्रांत समेत कई राज्यों को जीत लिया था।
जबकि दक्षिण और पूर्वी भारत में क्षेत्रीय राजवंशों जैसे काकतीय, यादव, पांड्य, और कलिंग राजाओं का शासन था। ऐसे में उस समय लगभग हिंदू साम्राज्य खत्म होने के कगार पर पहुंच चुका था और ओसा में भी हिंदू साम्राज्य खत्म होने की उम्मीद लगने लगी थी। लेकिन इस स्थिति को देखते हुए कलिंग साम्राज्य और गंग राजवंश के शासक नरसिंह देव प्रथम ने मुस्लिम साम्राज्य को खत्म करने की हिम्मत दिखाई, और उन्होंने अपनी चतुर नीति से मुस्लिम शासकों पर आक्रमण किया और उनके खिलाफ युद्ध लड़े।
लेकिन उसी दौरान काकतीय राजवंश के शक्तिशाली शासक गणपति देव ने कलिंग साम्राज्य पर हमला बोल दिया और फिर मुस्लिम शासक से लड़ने की जगह राजा नरसिंह देव प्रथम को काकतीय राजवंश के खिलाफ भयंकर युद्ध लड़ना पड़ा, और यह घमासान युद्ध 3 वर्षों तक दोनों राज्यों के बीच चला, लेकिन अंत में काकतीय राजा की हार हुई और नरसिंह देव विजय हुए, जिसके बाद राजा लंगुला नरसिंह देव बहुत सारा धन और वैभव लेकर घर लौटे।
विजय होकर लौटने पर महल में ढोल-नगाड़ों से उनका भव्य स्वागत किया गया। तब राजमाता कस्तूरा देवी ने गर्व से अपने पुत्र को गले लगाया और उनकी वीरता का गुणगान किया। इसके साथ ही राजमाता कस्तूरी देवी ने अपने बेटे से सालों से दिल में दबी बात कही। उन्होंने राजा लंगुला नरसिंह देव से कहा कि बेटे, तुम्हारे पिता ने शंख क्षेत्र पुरी में भगवान जगन्नाथ का एक भव्य मंदिर बनवाया था, और अब मैं चाहती हूं कि तुम अर्क क्षेत्र कोणार्क में उससे भी अधिक भव्य और विशाल सूर्य मंदिर का निर्माण करवाओ।
फिर अपनी मां की बात तो राजा ने मान ली, लेकिन उनके मन में एक विचार बार-बार आ रहा था कि आखिर मां कोणार्क में ही क्यों सूर्य मंदिर बनाने के लिए बोल रही है? और जब उन्होंने अपनी मां से यह सवाल पूछा, तो नरसिंह देव की मां ने उन्हें कोणार्क सूर्य मंदिर की एक पौराणिक धार्मिक कथा सुनाई जो कोणार्क मंदिर के महत्व और महिमा को दर्शाती है, जो इस मंदिर को भगवान कृष्ण से जोड़ती है। इस मंदिर के इतिहास की बात करें तो पुराणों के अनुसार, इस मंदिर के एक पवित्र तीर्थ होने का उल्लेख कपिल संहिता, ब्रह्म पुराण, भविष्य पुराण, सांबा पुराण, वराह पुराण में मिलता है।
उनमें इस प्रकार एक कथा लिखी हुई है जो द्वापर युग में घटी थी जिसके बारे में राजा नरसिंह देव को उनकी मां ने बताया था। राजमाता ने नरसिंह देव से कहा कि बेटा, भगवान श्री कृष्ण और जांभवती के पुत्र सांभ अत्यंत सुंदर और शीलवान थे। एक बार नारद मुनि ने ईर्ष्या में आकर उन्हें गोपियों संग झल क्रीड़ा के लिए उकसाया।
जब श्री कृष्ण को यह ज्ञात हुआ, तब उन्होंने क्रोध में सांप को श्राप दिया, जिससे वह कुष्ठ रोग से पीड़ित हो गए। बाद में जब सच्चाई सामने आई, तब भगवान श्री कृष्ण को पछतावा हुआ। तब नारद मुनि ने बताया कि सूर्य भगवान ही चर्म रोग से मुक्ति दे सकते हैं और उन्हें कोणार्क क्षेत्र, यानी कि मैत्रीय वन, जहां भगवान सूर्य की पहली किरण उड़ीसा राज्य के कोने पर ही पड़ती है।
वहां सूर्य देवता की तपस्या करने को कहा। तब सांप कोणार्क गए और वहां चंद्रभागा नदी के तट पर 12 वर्षों तक कठिन तपस्या की। प्रसन्न होकर सूर्यदेव ने उन्हें एक मूर्ति दी, जिसके स्पर्श से सांप रोग रोगमुक्त हो गए। कृतज्ञता स्वरूप सांप ने वहीं सूर्य मंदिर का निर्माण कराया जो कोणार्क के नाम से प्रसिद्ध हुआ। बेटा, जब मेरी शादी तुम्हारे पिता से हुई थी, तब हमारे कई वर्षों तक कोई संतान नहीं हुई थी।
तब हमने कोणार्क क्षेत्र में भगवान सूर्य से प्रार्थना की, जिसके फल स्वरूप तुम्हारा जन्म हुआ। अब अपने जन्म और सा की कथा के बारे में अपनी मां, राजमाता कस्तूरी देवी, से जानकर राजा नरसिंह देव प्रथम बहुत खुश हुए, और फिर उन्होंने 13वीं शताब्दी में सूर्यदेव को समर्पित कोणार्क सूर्य मंदिर को विश्व का सबसे भव्य सूर्य मंदिर बनाने का फैसला लिया है, जिसके लिए राजा ने प्रसिद्ध मूर्तिकार सिवई सामंत राय और उनके साथ ही वास्तुकार महाराणा बिसु को मंदिर बनाने की जिम्मेदारी दी।
फिर दोनों ने मिलकर सूर्य मंदिर का एक सुंदर प्रतिरूप बनाया और राजा नरसिंह देव को दिखाया, जिसे देखकर राजा खुश हो जाते हैं और मंदिर बनाने का काम तुरंत शुरू करने का आदेश देते हैं, और योजना बनाई गई कि भव्य सूर्य मंदिर का निर्माण कोणार्क के चंद्रभागा नदी के तट पर पद्म टोला गंड नामक स्थान पर किया जाएगा, जहां सूर्य की पहली किरणें मंदिर के विशाल शिखर पर पड़ेंगी, जिसके बाद मूर्तिकार सिवई सामंत राय और वास्तुकार महाराणा बिसु मंदिर मंदिर बनाने के लिए देश के कोने-कोने से एक से एक बेहतरीन 1200 शिल्पकारों को बुलाते हैं।
जिनके बदौलत कोणार्क सूर्य मंदिर का निर्माण बड़ी ही अद्भुत शैली में होता है, और इसी कड़ी में कोणार्क मंदिर के निर्माण में काफी घटना भी घटती है जिसके बारे में आपको आगे वीडियो में पता चलेगा जो आपके होश उड़ा देंगी क्योंकि यह मंदिर कोई आम मंदिर नहीं है, बल्कि यह एक अजूबा है, और हम ऐसा इसलिए कह रहे हैं क्योंकि जिस तरह से इस मंदिर के बनाने वाले की कहानी रोचक है,
वैसे ही इस मंदिर को बनने में लगे पत्थरों की भी कहानी काफी मजेदार है क्योंकि इस मंदिर के आसपास बहुत दूर तक किसी पर्वत के चिन्ह नहीं हैं। ऐसी अवस्था में इस विशालकाय मंदिर को बनाने के लिए जो पत्थर लगे, वो कहां से और कैसे लाए गए, यह एक अनसुलझी पहेली से कम नहीं है।
दरअसल इस मंदिर का स्वरूप और बनावट अद्भुत शिल्पकला का नमूना है जिसका निर्माण कलिंग स्थापत्य शैली के तहत किया गया था, जो बलुआ पत्थर और ग्रेनाइट से बना है। इसके अलावा, कोणार्क मंदिर को ब्लैक पगोड़ा भी कहा जाता है क्योंकि यह समुद्र के किनारे काले रंग के पत्थरों से बना है, जो एक बहुत बड़े और भव्य रथ के समान है।
जबकि इसे बनाने के लिए दूर-दूर से बड़े-बड़े पत्थर लाए गए। फिर इन बड़े पत्थरों को बड़ी सपाट लकड़ी की नावों पर लादकर नदी के बीच में ले जाकर नदी में गिराया गया ताकि मंदिर निर्माण के लिए समतल स्थल तैयार हो सके। लेकिन नदी में चाहे जितने भी पत्थर डाले जाते, वे तुरंत डूब जाते थे।
जिससे सब परेशान हो रहे थे। लेकिन फिर एक दिन जब मूर्तिकार सिवई सामंत राय एक झोपड़ी के बरादे में इसी बात पर विचार कर रहे थे कि आखिर कैसे वह जल्दी से जल्दी मंदिर बनाने के लिए समतल भूमि तैयार करें, उसी वक्त वहां एक बूढ़ी माता ने उन्हें गर्म बाजरे का दलिया खाने को दिया, और तब सिवई सामंत राय ने जल्दी-जल्दी में खाने के लिए अपना हाथ गर्म खाने के बीच में डाल दिया, जिससे उनका हाथ जल गया, और यह देखकर बूढ़ी माता ने कहा, “बेटा, गर्म खाना हो या फिर नदी में जाने से पहले किनारे सही करने पड़ते हैं।”
उनकी बात सुनकर सिवई सामंत राय को समझ आ गया कि नदी की भूमि समतल कैसे होगी, और यह जानने के बाद उन्होंने बूढ़ी माता को प्रणाम किया और वहां से नदी की तरफ चले गए, और एक सही योजना के साथ उन्होंने नदी को भरने के लिए किनारे से पत्थर डालना शुरू कर दिया और मंदिर निर्माण के लिए एक समतल स्थल तैयार करने में सफल रहे.
जिससे मंदिर का निर्माण कार्य तेजी से आगे बढ़ने लगा, और वही वही राजा ने यह आदेश भी दिया था कि जब तक मंदिर का काम पूरा नहीं हो जाता, किसी को भी घर जाने की अनुमति नहीं दी जाएगी, जिसके चलते 12 साल तक 1200 कारीगरों ने इस मंदिर को बनाने के लिए कठिन परिश्रम किया और एक भव्य मंदिर का निर्माण किया।
लेकिन उन सब की आखिरी चुनौती तब सामने आई जब उन्होंने मंदिर का कलश स्थापित करने की कोशिश की और उन सभी की लाख कोशिशों के बाद भी कोणार्क मंदिर के गुंबद पर विशाल चुंबकीय कलश को उचित स्थान पर स्थापित नहीं किया जा सका, जिससे सभी लोग निराश होने लगे और इधर काफी अधिक समय बीत जाने पर राजा अधीर हो गए। फिर राजा ने परेशान होकर यह आदेश दिया कि यदि अगले दिन सुबह तक कलश स्थापित न हुआ तो सभी कामगारों और शिल्पकारों को मृत्युदंड दे दिया जाएगा। जहां एक तरफ महाराणा विषु की जान पर बात आ गई थी।
वहीं दूसरी तरफ, उनकी पत्नी और उनका पुत्र धर्मपद, जो 12 साल का होने वाला था, वह अपने जन्मदिन पर अपने पिता महाराणा बिसु से पहली बार मिलने के लिए अपनी मां से जिद कर रहा था क्योंकि उसने आज तक अपने पिता को नहीं देखा था क्योंकि जब उसके पिता मंदिर बनाने के लिए कोणार्क जा रहे थे, तब वह अपनी मां के गर्भ में था, और अब जब वह 12 साल का होने वाला है, तब तक उसके पिता घर लौट कर नहीं आए थे।
लेकिन धर्मपद अपनी मां से अपने पिता की शिल्प कला की कहानियां सुनते हुए बड़ा हुआ था, और इसलिए उसे बचपन से ही वास्तुकला और शिल्प कला में रुचि थी, और एक महान मंदिर वास्तुकार विषु विषुमहाराणा का बेटा होने के नाते उसके पास मंदिर निर्माण के विवरण का वर्णन करने वाली हस्तलिपि थी।
इसलिए जब वह 12 साल का हुआ तब तक उसने ओडिया मंदिर वास्तुकला की कला में महारत हासिल कर ली थी। लेकिन वह हमेशा उदास रहता था, क्योंकि उसने अपने पिता को कभी नहीं देखा था। इसलिए अपने 12वें जन्मदिवस पर उसने अपनी मां से एक उपहार के तौर पर अपने पिता से मिलने का मौका मांग लिया, जिसके बाद उसकी मां ना चाहकर भी अपने बेटे को अपने पिता से मिलने जाने से रोक ना सकी और धर्मपद की मां ने उसे साथ ले जाने के लिए कुछ खाना दिया और उसे अपना कुत्ता बलिया को अपने साथ ले जाने के लिए कहा ताकि उसके पिता उसे बलिया को देखकर पहचान जाए।
फिर जब वह मंदिर के निर्माण स्थल पर पहुंचा तो बलिया ने अपने मालिक विषु महाराणा को पहचान लिया और उनके पास गया। फिर धर्मपद भी अपने पिता से मिलकर उन्हें प्रणाम किया और उन्हें अपना परिचय दिया। उनके पिता उससे मिले, लेकिन उनके चेहरे पर खुशी का भाव नहीं था क्योंकि वह कलश स्थापित ना कर पाने की चिंता से परेशान थे, और फिर जब धर्मपद ने अपने पिता से उनकी चिंता का कारण पूछा तो उन्होंने उसे सारा सच बता दिया, जिसे सुनने के बाद धर्मपद ने अपने पिता से कहा कि अगर आप मुझे अनुमति दें तो मैं मंदिर के गुंबद पर कलश स्थापित कर सकता हूं।
जिसके बाद कोई चारा ना दिखने पर विषु महाराणा ने अपने बेटे को कलश स्थापित करने की अनुमति दे दी, और तभी धर्मपद मंदिर के गुंबद पर चढ़ गया, जहां उसने अपनी सूझबूझ और अध्ययन से शिल्पकारों को कुछ महत्वपूर्ण समायोजन की बातें बताईं, जिससे कुछ ही समय में कलश अपनी जगह पर स्थापित हो गया, और कलश स्थापित होने के साथ ही वहां पर उसी समय एक चमत्कार हुआ। दरअसल, कलश स्थापित होते ही गुंबद के भीतर चुंबक की शक्ति के कारण सूर्य भगवान की भव्य मूर्ति हवा में झूलने लगी, जिससे वहां मौजूद कलाकार खुशियों से झूम उठे।
लेकिन वहीं कुछ कलाकारों ने इसका विरोध करते हुए कहा कि कल जब राजा को पता चला कि जो काम 1200 शिल्पकारों की टोली से नहीं हुआ, उसे एक 12 साल के लड़के ने कर दिखाया, तो राजा जरूर सोचेंगे कि हम अपना काम ठीक से नहीं कर रहे थे और हम सभी को मौत की सजा दे दी जाएगी। अब यह सुनकर कुछ लोगों ने तर्क दिया कि धर्म पद को हमेशा के लिए चुप करा दिया जाए तो 1200 शिल्पकारों की जान और इज्जत दोनों बच सकती है।
लेकिन जब विषु महाराणा ने यह सुना तो वह गुस्सा हो गए। उन्होंने सबसे कहा कि आज ही मैं अपने बेटे से पहली बार मिला हूं और आज ही तुम लोग इसे मारने की बात कर रहे हो। लेकिन बात 1200 कामगारों की जान और एक 12 साल के बच्चे की जान के बीच आप फंँसे थे।
जिसे देखकर धर्मपद ने महसूस किया कि उसकी सफलता ने उसके पिता को कितने तनाव में डाल दिया है। इसलिए उसने एक दिल दहला देने वाला फैसला कर लिया। वह तभी भीड़ के बीच से गुजर कर मंदिर के शिखर पर चढ़ गया और कुछ देर में वह कलश के शिखर पर जाकर खड़ा हो गया। वहां उसने देखा कि जिस कलश को उसने अभी-अभी स्थापित किया था, वहां सूर्य की किरणें मंदिर को छू रही थी और ऐसा लग रहा था कि मानो सूर्यदेव मंदिर पर अपना आशीर्वाद बरसा रहे हों। तभी धर्मपद ने मंदिर के शिखर से नदी के गहरे पानी में छलांग लगा दी और वह डूब गया।
जिसे देखकर वहां मौजूद लोगों की आंखों से आंसू बहने लगे, क्योंकि एक 12 साल का बालक जो अब तक सही से दुनिया नहीं देखा था, वो दुनिया का सबसे बड़ा मंदिर बनाकर 1200 कलाकारों का जीवन बचाने के लिए अपने जीवन का बलिदान कर दिया। जिसका जिक्र मुगल शासक अकबर के नवरत्नों में से एक अबुल फजल ने भी अपनी किताब आईने-अकबरी में किया है, जिसमें अबुल ने लिखा है कि इस मंदिर में उड़ीसा राज्य के 12 वर्ष की सारी कमाई लगी थी।
कोणार्क मंदिर को सूर्य देवता के रथ के आकार का बनाया गया था, और यह मंदिर समय की गति को भी दर्शाता है, जिसमें रथ के 12 जोड़ी पहिए लगे हुए हैं और रथ को सात बलशाली घोड़े खींच रहे हैं। ये सात घोड़े सात दिनों के प्रतीक हैं, जबकि यह भी माना जाता है कि ये 12 पहिए साल के 12 महीनों के प्रतीक भी हैं।
कहीं-कहीं इन 12 जोड़ी पहियों को दिन के 24 घंटों के रूप में भी देखा जाता है। इस मंदिर में आठ ताड़ियां भी हैं, जो दिन के आठ प्रहर को दर्शाती हैं, और इसे देखने पर ऐसा लगता है कि मानो इस रथ पर स्वयं सूर्य देव बैठे हैं। इसके साथ ही यह मंदिर 29 फीट ऊंचा है। इस मंदिर में सूर्य के उगने, ढलने और डूबने के सभी स्टेप्स को दर्शाया गया है।
इस मंदिर का परिसर लगभग 26 एकड़ भूमि में फैला हुआ है। मंदिर के दक्षिणी हिस्से में दो घोड़े बने हुए हैं, जिन्हें राज्य सरकार द्वारा अपने राज चिन्ह के तौर पर भी चुना गया है। इस मंदिर के अंदर सूर्य भगवान की मूर्ति को ऐसे रखा गया था कि उगते हुए सूर्य की पहली किरण उस पर आकर गिरती थी, जिसकी रोशनी से पूरा मंदिर जगमगा उठता था। मंदिर के अंदर जगह-जगह पर फूलबेल और ज्यामितीय नमूनों की सुंदर नक्काशी की गई है।
इनके साथ ही मानव, देव, गंधर्व, किन्नर आदि के सुंदर चित्रों को भी एन् मुद्राओं में दिखाया गया है। वहीं इस मंदिर की सबसे रोचक बात यह है कि मंदिर के लगे चक्रों पर पड़ने वाली छाया से हम समय का सही और सटीक अनुमान लगा सकते हैं। यह प्राकृतिक धूप घड़ी का काम करता है। लेकिन इन सब के अलावा इस मंदिर के कई और अजीबोगरीब रहस्य भी हैं, जिस वजह से इस मंदिर को लोग आठवां अजूबा कहते हैं। उन्हीं में से एक था इस मंदिर की चुंबकीय ताकत। इस मंदिर के ऊपर 51 मीट्रिक टन का चुंबक लगा हुआ था, और यह माना जाता है कि इस मंदिर को चुंबकीय पत्थरों से बनाया गया था।
जिसके गर्भ गृह के शीर्ष पर एक विशाल चुंबकीय पत्थर रखा गया था, जो मंदिर की संरचना को स्थिर रखता था। इसका इफेक्ट इतना ज्यादा था कि इसके कारण समुद्र से गुजरने वाले जहाज इस चुंबकीय क्षेत्र के चलते भटक जाया करते थे और इसकी ओर खींचे चले आते थे, और इन जहाजों में लगा कंपास, यानी कि दिशा सूचक यंत्र, गलत दिशा दिखाने लग जाता था। कुछ इतिहासकारों का कहना है कि इससे परेशान होकर पुर्तगालियों ने इस पत्थर को हटाने का काफी प्रयास किया, और काफी मेहनत मशक्कत के बाद उन्होंने मंदिर के बहुमूल्य चुंबक को हटा दिया और उसे अपने साथ ले गए।
जहाजों के दिशा भटकने को लेकर आपको किसी प्रकार का कोई कंफ्यूजन ना हो। इसलिए हम आपको बताना चाहेंगे कि यह कोणार्क मंदिर पहले समुद्र के बहुत ही नजदीक हुआ करता था। लेकिन पिछले आठ दशक में समुद्र से इस मंदिर की दूरी धीरे-धीरे बढ़ती चली गई। अब हम आपको जो बताने जा रहे हैं, वह सुनने में आपको थोड़ा अटपटा भले ही लगे, लेकिन अगर आप इस मंदिर को देखेंगे, तो इस मंदिर को इस प्रकार बनाया गया था कि जैसे कोई सैंडविच हो जिसके बीच में लोहे की परत थी, जिस पर मंदिर के पिलर अटके हुए थे।
जिसके कारण ही लोग इस बात पर यकीन करते हैं कि कोर्नार्क के पास से गुजरने वाले जहाज सच में खींचे चले आते थे क्योंकि यह मंदिर अद्भुत तरीके से बनाया गया था और इसके साथ ही जिस तरह से यहां सूर्य भगवान की मूर्ति बनी थी, वैसी मूर्ति किसी भी भगवान की कहीं नहीं बनाई गई क्योंकि इस मंदिर में सूर्य भगवान की हवा में तैरती हुई एक विशाल मूर्ति बनाई गई थी जिस पर लगभग एक “52 टन का चुंबक” (52-ton magnet) मंदिर के ऊपरी हिस्से में लगाया गया था।
निचले हिस्से में दो पत्थरों को आपस में जोड़ने के लिए लोहे की चादर और चुंबक का इस्तेमाल किया गया था, जिससे निचले हिस्से में लगे चुंबक के बीच में एक खिंचाव तैयार होता था। अब यह तो हुई भगवान सूर्य की मूर्ति की बात। लेकिन इसके अलावा, कोणार्क मंदिर की दीवारों पर की गई बारीक से बारीक नक्काशी बेहद अद्भुत है, जिसके बारे में कहते हैं कि इसमें वैसे तो तीन प्रकार की नक्काशी है।
जिसमें पहला धार्मिक दृश्य, यानी कि सूर्य देवता और अन्य देवताओं की मूर्तियां; वहीं दूसरा सामाजिक जीवन, यानी कि नृत्य, संगीत और सामूहिक उत्सव; और तीसरा कामुक दृश्य, यानी कि मंदिर की दीवारों पर कामुक शिल्प कला भी दिखाई देती है जो कामसूत्र से प्रेरित है। यह जीवन के सभी पहलुओं को संतुलित रूप से दर्शाने का प्रतीक है, और कोणार्क का सूर्य मंदिर कामुकता को एक नई परिभाषा देता है।
मध्य प्रदेश के खजुराहो मंदिर की तरह ही इस मंदिर की दीवारों पर बनी मूर्तियों में बड़ी ही खूबसूरती के साथ काम और सेक्स को दर्शाया गया है। यहां बनी मूर्तियां पूर्ण रूप से यौन सुख का आनंद लेती दिखाई गई हैं।
यह भी पढ़े – महाकालेश्वर मंदिर के अनसुलझे रहस्य, जिन पर विज्ञान भी हैरान है
मजे की बात यह है कि इन मूर्तियों को मंदिर के बाहर तक ही सीमित किया गया है, और ऐसा करने के पीछे का कारण यह बताया जाता है कि जब भी कोई मंदिर के गर्भगृह गृह में जाए तो वह सभी प्रकार के सांसारिक सुखों और मोहमाया माया को मंदिर के बाहर ही छोड़कर आए, जबकि कहा जाता है कि यहां आज भी कामुकता नाचती है। तभी तो कोणार्क मंदिर के बारे में एक मिथक यह भी बोला जाता है कि यहां आज भी नर्तकियों की आत्माएं आती हैं।
अगर यहां के क्षेत्रीय लोगों की मानें तो आज भी यहां आपको रात को उन नर्तकियों की पायलों की झंकार सुनाई देगी जो कभी यहां राजा के दरबार में नृत्य किया करती थी। इन सब के अलावा इस मंदिर के द्वार पर जो सिंह की मूर्ति बनी है, उसका भी अपना ही एक अलग इतिहास है। दरअसल मंदिर के प्रवेश द्वार पर दो विशालकाय सिंहों की मूर्तियां हैं जो हाथियों को कुचलते हुए दिखाई देती हैं। यह सिंह शक्ति और विजय का प्रतीक हैं।
हाथी मानव स्वभाव की कमजोरी और वासना को दर्शाते हैं, जिसमें सिंह के नीचे हाथी है और हाथी के नीचे मानव शरीर है। इस मूर्ति में आप देखेंगे कि एक शेर हाथी को दबाकर बैठा है और हाथी एक इंसान को दबाकर बैठा है, जिसके बारे में लोगों का मानना है कि यह शेर इंसान के घमंड को दर्शाता है और हाथी इंसान की संपत्ति और पैसे को दर्शाता है।
इन मूर्तियों को बनाने का उद्देश्य यह था कि लोग अपनी बुरी आदतों को समझें कि कैसे इंसान अपने घमंड और संपत्ति के लालच में दबा जा रहा है। कोणार्क की यह मूर्ति बताती है कि यदि इन दोनों चीजों की लत लग जाए तो इंसान की जिंदगी खत्म हो जाती है। लेकिन हैरानी की बात यह है कि इतना ज्ञान देने वाले इस मंदिर में कभी भी किसी प्रकार की पूजा नहीं की गई और ना ही की जाती है।
ऐसा मंदिर जिसमें कोई पूजा नहीं की जाती, यह बहुत आश्चर्य की बात है क्योंकि एक तरफ जिसे मंदिर कहा जाए, वहीं पूजा ना हो, यह भी किसी अचंभे से कम नहीं है। लेकिन क्यों कोणार्क मंदिर में पूजा नहीं होती है?
इसके बारे में यहां के स्थानीय लोगों की अगर मानें तो आज तक इस मंदिर में कभी पूजा नहीं हुई और अब तक यह मंदिर एक वर्जित मंदिर है, जिसके बारे में भारतीय इतिहास पर नजर डालने पर जानकारी मिलती है कि जब वास्तुकार महाराणा बिसु के बेटे धर्मपद ने 1200 शिल्पकारों और वास्तुकारों का जीवन बचाने के लिए अपने जीवन का बलिदान कर दिया।
तब उसके कुछ देर बाद वहां राजा नरसिंह देव प्रथम आए। उन्होंने आते ही कलश को अपनी जगह पर स्थापित देखा, और इसके साथ ही उन्होंने मंदिर में भगवान सूर्य की मूर्ति को हवा में तैरते हुए देखा, जिसे देखकर उन्होंने प्रसन्न होकर सिवई सामंत राय और विष्णु महाराणा की खूब प्रशंसा की और सभी 1200 कामगारों को खूब सारा धन बांटा, और इसी खुशी के माहौल में किसी ने उन्हें 12 साल के बच्चे की आत्महत्या की बात नहीं बताई, जबकि उन्होंने खुशी-खुशी में मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा तुरंत ही अगले दिन करने का आदेश दे दिया।
लेकिन उनसे सिवई सामंत राय ने कहा कि प्राण प्रतिष्ठा के लिए यह सही समय नहीं है। मगर राजा ने उनकी एक बात नहीं मानी और जल्दीबाजी में मंदिर में मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा करवा दी। लेकिन मंदिर में मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा के बाद ही कुछ रहस्यमयी घटनाएं घटने लगीं, जिसमें सबसे पहले मंदिर में मौजूद शेर की विशाल मूर्ति के कई पत्थर धीरे-धीरे मंदिर में गिरने लगे और लोगों ने धीरे-धीरे इस मंदिर को शापित कहना शुरू कर दिया क्योंकि यह विशाल मंदिर धीरे-धीरे टूटने लगा और तब राजा नरसिंह देव को एहसास हुआ कि सिवई सामंत राय सही कह रहे थे, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी।
जिसके बाद से इस मंदिर में पूजा और कोई भी धार्मिक अनुष्ठान नहीं किया गया और इस पर हमेशा के लिए रोक लगा दी गई। कोणार्क मंदिर में पूजा पर लगी रोक के अलावा भी एक और बात जो इस मंदिर पर चांद पर लगे दाग के समान दिखती है, और वह है इस मंदिर का निर्माण अधूरा है। हैरान मत होइए। यह बात सच है कि यह मंदिर अभी तक अधूरा बना है। लेकिन इस विशाल मंदिर को क्यों अधूरा ही बना रखा गया है? इसे पूरा क्यों नहीं बनाया गया है? इस बारे में हर किसी के अपने-अपने विचार हैं। लेकिन जब बात इतिहास की है, तो आइए इसका जवाब हम इतिहास में ही खोज लेते हैं।
इतिहासकारों के अनुसार, कोणार्क मंदिर का निर्माण कभी पूरा नहीं हो सका, जिसके बारे में ऐसा कहा जाता है कि इस मंदिर के निर्माण के दौरान कुछ मजदूरों ने इस मंदिर में कुछ तकनीकी गलतियां की थीं, जिससे इसका गर्भग्रह गिर गया था। साथ ही, “धर्मपद का बलिदान” (Sacrifice of Dharmapada) से खुद भगवान सूर्य गुस्सा हो गए थे, जिस वजह से फिर कभी यह मंदिर पूरा नहीं बन पाया। जबकि वहीं, इस मंदिर के बारे में कुछ जानकारों का तर्क यह भी है कि अभी जो हम इस मंदिर के अधूरे ढे ढांचे को देखते हैं।
उसका मुख्य कारण राजा नरसिंह देव प्रथम की मृत्यु है क्योंकि उनके मरने के बाद कोणार्क मंदिर का निर्माण नहीं हो सका। लेकिन यह मंदिर जितना भी बना है, वह आज भी लाजवाब दिखता है। तभी तो इस मंदिर की नक्काशी और शिल्प कला के चर्चे दुनिया भर में होते हैं। लेकिन फिर भी आधुनिकता और धार्मिकता का संकेत देने वाला यह मंदिर जल्द ही खत्म भी हो गया क्योंकि इस मंदिर पर बहुत विदेशी लुटेरों ने आक्रमण किया, और इन्हीं विदेशी आक्रमणकारियों ने कोणार्क मंदिर की बेहतरीन नक्काशी को लूटकर मंदिर को बर्बाद कर दिया।
लेकिन अब यह जानकर आपके दिमाग में यह सवाल उठ रहा होगा कि आखिर कौन थे वे लुटेरे और उनका मूर्ति तोड़ने के पीछे क्या मकसद था? कोणार्क मंदिर का विनाश कैसे हुआ? कोणार्क मंदिर का विनाश अचानक नहीं हुआ था, बल्कि इसके विनाश के कारण धीरे-धीरे सामने आए थे, क्योंकि कोणार्क मंदिर के विनाश के पीछे मुस्लिम आक्रमणकारी, प्राकृतिक आपदाएं, और बनावट में कमजोरियों का हाथ रहा है। लेकिन मंदिर के विनाश में विदेशी आक्रमणों की भूमिका को भी नकारा नहीं जा सकता।
क्योंकि विदेशी आक्रमणों, यानी कि लुटेरे मुस्लिम आक्रमणकारियों के कारण ही इस विशाल और खूबसूरत मंदिर का अंत हुआ था, और इसकी शुरुआत हुई थी 13वीं शताब्दी से लेकर 15वीं शताब्दी के बीच में जब मुस्लिम आक्रमणों ने मंदिर को गंभीर क्षति पहुंचाई थी। यह बात है 1508 ईस्वी की जब देश के बड़े मंदिरों पर मुस्लिम आक्रमणकारियों का हमला हुआ, और इन्हीं मुस्लिम आक्रमणकारियों में से एक था सुल्तान सुलेमान खान करानी का जनरल काला पहाड़।
इस काला पहाड़ की भी बड़ी ही अजब गजब कहानी है जो निश्चित ही आपके होश उड़ा देगी। इसके बारे में हम जल्द ही एक वीडियो लाने वाले हैं। अगर आप यह वीडियो पब्लिश होने के 2 महीने बाद देख रहे हैं, तो एक बार इस वीडियो के डिस्क्रिप्शन को चेक कर लेना। आपको वीडियो मिल जाएगी।
दरअसल काला पहाड़ ने उड़ीसा पर हमला किया था और उसने जब ओसा पर हमला किया तो उसने हिंदू धार्मिक स्थलों को निशाना बनाया और इस आक्रमणकारी ने मंदिरों को न केवल लूटा बल्कि कोणार्क मंदिर में बैठे भगवान की मूर्तियों और संरचनाओं को भी नुकसान पहुंचाया और इस हमले के दौरान उसने उड़ीसा के कई मंदिरों पर हमला किया और बड़ी बेरहमी से मंदिरों का विनाश कर दिया। उसके लिए हमारे मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं थे बल्कि हिंदू समाज की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक पहचान का प्रतीक था और हिंदुओं की प्रतीक पहचान को पूरी तरह से खत्म करने के लिए ही काला पहाड़ और मुस्लिम आक्रमणकारियों ने हिंदू मंदिरों पर हमला किया था।
फिर हमले के दौरान जब काला पहाड़ कोणार्क सूर्य मंदिर पहुंचा, तो उसने वहां सूर्यदेव की विशाल मूर्ति को हवा में झूलते हुए देखा। हवा में तैरती उस मूर्ति को देखकर उसके होश उड़ गए। इसलिए काफी देर तक वो सूर्यदेव की विशाल मूर्ति को तैरते हुए देखता रहा, जिसके बाद उसने अपनी सेना के साथ मंदिर की दीवारों पर हमला कर दिया। कोणार्क मंदिर की दीवारों को तोड़ना इतना आसान नहीं था क्योंकि इस मंदिर की दीवारें 20 से 25 फीट से भी अधिक मोटी थीं।
लेकिन उसने इस मंदिर की दीवारों को तोड़ने की कई बार कोशिश की, और आखिरकार वह कोणार्क मंदिर के मुख्य पत्थर को हटाने में कामयाब हो गया, और जैसे ही उसने मंदिर के मुख्य पत्थर को हटाया, कुछ ही पलों में मंदिर का 200-फुट ऊंचा मेन टावर पत्थरों के ढेर में बदल गया।
फिर उसने कोणार्क मंदिर में सूर्य देवता की मुख्य मूर्ति को तोड़ दिया, जबकि इस मूर्ति को मंदिर की आत्मा माना जाता था, और इसे उसने समुद्र में फेंक दिया, और यह घटना सिर्फ लूट के लिए ही नहीं की गई थी, बल्कि उसका उद्देश्य सूर्य देवता की मुख्य मूर्ति को तोड़ने के साथ ही इस मंदिर के धार्मिक महत्व को खत्म करना भी था, जिसमें मुस्लिम आक्रमणकारी कामयाब भी हुए, क्योंकि यह घटना हिंदू समाज के लिए एक गहरा आघात साबित हुई थी, जिसमें मुस्लिम आक्रमणकारियों ने न केवल मूर्ति को नष्ट किया, बल्कि मंदिर की दीवारों पर की गई अद्वितीय नक्काशियों और मूर्तियों को भी नुकसान पहुंचाया।
फिर कोणार्क मंदिर की संपत्ति लूटी गई और इसे एक खंडहर में बदल दिया गया, और इस तरह हमारी धरोहर की पहली बर्बादी की शुरुआत हुई। जबकि कोणार्क मंदिर के विनाश की कुछ कहानियां तो यह भी कहती हैं कि काला पहाड़ ही अकेले कोणार्क मंदिर के विनाश का कारण नहीं था, बल्कि कई इतिहासकारों का मानना है कि कोणार्क मंदिर के विनाश के लिए भूकंप और ज्वालामुखी फटने जैसी प्राकृतिक आपदाएं भी एक ठोस कारण रही हैं, और इन्हीं प्राकृतिक आपदाओं के कारण ही इस मंदिर के आसपास की सभी झीलें और तालाब सूख गए, जिसके बारे में कई शोध भी हुए हैं।
कोणार्क मंदिर के विनाश को लेकर क्या रिसर्च हुई? कोणार्क मंदिर के विनाश को लेकर एक आईआईटी खड़कपुर के वैज्ञानिक के द्वारा की गई रिसर्च में कोणार्क सूर्य मंदिर से 2 किलोमीटर दूर प्राचीन भारत की प्रचलित नदी चंद्रभागा में ऐसे अवशेष मिले हैं जिससे यह साबित होता है कि वहां पहले एक नदी हुआ करती थी जो अब पूरी तरीके से सूख चुकी है।
लेकिन अब जानते हैं कि मंदिर से भगवान सूर्य की मूर्ति निकल जाने के बाद क्या हुआ था और फिर कोणार्क मंदिर की बची कलाकृतियां कहां चली गईं. कोणार्क मंदिर के विनाश के बाद मंदिर की चीजों का फिर क्या हुआ? कोणार्क मंदिर से मूर्ति निकल जाने के बाद कोणार्क मंदिर में भक्तों का आना-जाना पूरी तरह से बंद हो गया.
तब 17वीं और 18वीं सदी के दौरान कोणार्क मंदिर की कालाकृतियों को निकालकर उड़ीसा के दूसरे मंदिरों में बसाया गया। फिर 1779 में एक मराठा साधु ने कोणार्क मंदिर के एक खंभे को हटाकर जगन्नाथ पुरी के गेट के सामने बसाया था। इसी तरह 18वीं सदी के अंत तक कोणार्क मंदिर की सारी शान खत्म हो गई। और यह छोटा सा शहर एक घने जंगल में बदल गया।
एक ऐसा जंगल जहां सिर्फ जंगली जानवर ही रहते थे। इंसान दिन की रोशनी में भी इस जंगल में जाने से कतराते थे। सूर्य भगवान का यह भव्य मंदिर सिर्फ एक खंडहर बनकर रह गया। कहा जाता है कि आज कोणार्क मंदिर को हम जिस अवस्था में देखते हैं, असल में यह तो सिर्फ आधा ही है, जबकि इससे भी दो गुना ज्यादा बड़ा हुआ करता था।
हमारा कोणार्क मंदिर और एक समय था जब कोणार्क मंदिर इतना ऊंचा दिखता था कि समुद्र में सैकड़ों किलोमीटर दूर से नाविकों को भी कोणार्क का टावर दिख जाता था। इसी तरह अभी कोणार्क मंदिर में केवल एक मंडप है, लेकिन सालों पहले इस मंदिर में कुल तीन मंडप हुआ करते थे।
लेकिन फिर दो मंडप गए कहां? इसके बारे में कहा जाता है कि बाकी के दो मंडप कई सदियों पहले ही पूरी तरह से नष्ट हो गए थे। इन दो मंडपों के नष्ट होने के पीछे कई अलग-अलग कारण बताए जाते हैं। कुछ लोगों का मानना है कि कुछ आक्रमणकारियों ने इस मंदिर पर हमला करके इसके दोनों मंडपों को खत्म कर दिया, वहीं कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि दरअसल कोणार्क का मंदिर पूरी तरह से कभी बन ही नहीं पाया था।
मंदिर का जो हिस्सा अधूरा था, वह समय के साथ खुद ही ध्वस्त हो गया, जिसके बारे में कुछ इतिहासकार तो यह भी बताते हैं कि प्राचीन काल में कोणार्क बहुत ही प्रसिद्ध और समृद्ध शहर हुआ करता था। लेकिन जब 16वीं शताब्दी के दौरान इस मंदिर से सूर्यदेव की प्रतिमा को हटा दिया गया, उसके बाद से श्रद्धालुओं और भक्तों का यहां पर आना-जाना लगभग बंद ही हो गया, और फिर धीरे-धीरे यह शहर वीरान होता चला गया और अंत में यह एक जंगल में तब्दील हो गया, यानी कि इसके आसपास जंगल ही जंगल फैल गया।
जिससे यह जगह लोगों को बर्बाद और खंडहर लगने लगी। लेकिन जब यह मंदिर और यहां की चीजें पूरी तरह से तहस-नहस हो चुकी थी, तो फिर आज जो हम कोणार्क मंदिर और वहां के आसपास की चीजें जो हमें दिखाई देती हैं, उसको दोबारा कब और फिर कैसे बनाया गया? यानी कि पूरी तरह से गुमनामी में खो जाने वाले इस कोणार्क मंदिर को किसने खोजा? कोणार्क मंदिर किसके द्वारा खोजा गया? कहा जाता है कि कोणार्क मंदिर को आक्रमणकारियों के डर से उड़ीसा के पुजारियों ने रेत में दबा दिया था, जिसके बाद यह वीरान हो गया और इसके ऊपर जंगल उग आया था।
कई सदियों तक वीरान पड़े रहने के बाद 1889 में जब इस मंदिर के बारे में स्कॉटिश इतिहासकार जेम्स फॉर्गुसन को पता चला, तब उसने कोणार्क मंदिर को ढूंढा और इस मंदिर पर चढ़ाई की। तभी से कोणार्क मंदिर को पूरी दुनिया के लोगों ने जानना शुरू किया।
फिर 19वीं शताब्दी में जब भारत ब्रिटिश, यानी कि अंग्रेजों, का गुलाम था और हमारा देश अंग्रेजों के शासन के अंतर्गत चलाया जाता था, तब ब्रिटिश अधिकारियों ने कोणार्क मंदिर को देखा और इसके महत्व को पहचाना और इसे सही करने और इसमें सुधार करने के लिए कदम उठाए, क्योंकि हमारा कोणार्क मंदिर है ही इतना प्यारा कि यह खंडहर होने के बावजूद भी बहुत अट्रैक्टिव दिखता है। ब्रिटिशों ने सबसे पहले इस मंदिर के वेस्ट को रेत से बाहर निकाला, और वे यह देखकर दंग रह गए कि रेत में दबे इस मंदिर की ऊंचाई 29 फीट है।
इसके बाद कोणार्क मंदिर को फिर से सही करने के लिए सन 1901 में ब्रिटिश गवर्नर जनरल जॉन वुडबर्न को इस मंदिर को फिर से बनाने और इसे संरक्षण देने का काम सौंपा गया, जिसके बाद फिर देखते ही देखते यह मंदिर एक सांस्कृतिक पर्यटन स्थल में बदल गया।
लेकिन टूरिस्ट प्लेस बनने के बाद भी इस मंदिर में कोई भी मैन गेट से नहीं जा सकता था, क्योंकि ब्रिटिश सरकार ने संरक्षण के वक्त इस मंदिर के मुख्य द्वार को रेत की मदद से बंद कर दिया था। जबकि इसके पीछे का क्या कारण था यह आज तक किसी को नहीं पता, लेकिन फिर भी इसके पीछे एक कहानी है जो बताती है कि कोणार्क मंदिर के एक बार खंडहर हो जाने के कई सालों के बाद दोबारा इस मंदिर की खोज जब की गई थी।
तब तक कोणार्क मंदिर के कई हिस्से अपने आप ढहकर नष्ट हो गए, और यह माना जाता है कि आज इस मंदिर में एक ही मंडप बचा हुआ है। लेकिन यह भी आश्चर्य की बात है कि मंडप के अंदर जाने के सभी रास्ते पूरी तरीके से सील कर दिए गए हैं, जिसके बारे में बताया जाता है कि 108 साल पहले ही इस रास्ते को सील कर दिया गया था जो आज भी बंद है।
वैसे, कोणार्क मंदिर के बंद दरवाजे के पीछे यह तर्क भी दिया जाता है कि 19वीं सदी के अंत तक कोणार्क मंदिर का आखिरी मंडप भी कमजोर होकर गिरने के कगार पर आ चुका था। ऐसे में, इस मंदिर को पूरी तरीके से गिरने से बचाने के लिए और किसी भी श्रद्धालुओं को कोई नुकसान ना हो, इसीलिए इस मंडप के दरवाजे को उस समय के तत्कालीन गवर्नर जनरल जॉन वुडबर्न ने सन 1901 में इस मंदिर के दरवाजे को सील कर दिया था।
हालांकि बाद में कोणार्क मंदिर के मुख्य दरवाजे को खोलने के लिए कई बार फैसले लिए गए, लेकिन हर बार कुछ ना कुछ कारण से इस दरवाजे को खोलने से टाल दिया गया। इस तरह इतनी सदियों के बीत जाने के बाद भी अभी तक यह दरवाजा सील ही पड़ा है। हालांकि दरवाजे के बंद रहने के पीछे कुछ कारण अंधविश्वास या कुछ रहस्यमई घटना भी जुड़ी है, ऐसा भी कई लोग मानते हैं। लेकिन इसमें कितनी सच्चाई है और कितनी नहीं, यह पता लगाना और इस बारे में कुछ भी कह पाना अभी मुश्किल है।
जबकि यह बात पूरी तरीके से सच है कि हमारा कोणार्क सूर्य मंदिर आधुनिक वास्तुकला और सांस्कृतिक धरोहर के रूप में पूरी दुनिया में फेमस है क्योंकि इससे बेहतर मंदिर आज तक कहीं भी नहीं बन पाया है और इसी कारण से यूनेस्को ने इसे विश्व सांस्कृतिक धरोहर घोषित कर दिया। तभी इस मंदिर से जुड़ा इतिहास हमें यह सोचने पर मजबूर कर देता है कि शायद हमारे पूर्वज समय से कहीं ज्यादा आगे थे। तभी हमारे देश भारत को विश्व गुरु और सोने की चिड़िया कहा जाता था।
जुड़िये हमारे व्हॉटशॉप अकाउंट से-






