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संसद का मानसून सत्र: हंगामे और गतिरोध से परे, लोकमंगल और समाधान का नया संकल्प बने

Parliament Monsoon Session Democracy

भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था का सबसे बड़ा बल और उसकी आत्मा हमारी संसद है। यह केवल ईंट-पत्थरों से बना एक ऐतिहासिक भवन या सिर्फ नए कानून पारित करने की कोई औपचारिक मशीन नहीं है, बल्कि यह देश की सवा सौ करोड़ जनता की आकांक्षाओं, उनकी बुनियादी समस्याओं और राष्ट्र के भविष्य की दिशा तय करने वाला सर्वाेच्च मंच है। ऐसे में प्रारंभ हो रहा संसद का आगामी मानसून सत्र केवल एक नियमित संसदीय प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह हमारे लोकतंत्र की परिपक्वता की एक नई और कड़ी परीक्षा भी है।

देश का आम नागरिक आज सत्ता और विपक्ष दोनों से यह उम्मीद लगाए बैठा है कि सदन के भीतर का यह कीमती समय शोर-शराबे, तीखे व्यक्तिगत आरोपों और गतिरोध की भेंट न चढ़े, बल्कि वहां गंभीर विमर्श, स्वस्थ बहस और जनहित में ठोस निर्णय लिए जाएं।

1. अनुत्पादक संसद: जनता के संसाधनों का नुकसान

पिछले कुछ वर्षों का इतिहास देखें तो संसद के भीतर के दृश्य लोकतांत्रिक गरिमा को बढ़ाने वाले कम और राजनीतिक टकराव के अखाड़े अधिक प्रतीत हुए हैं। सदन में देश की नीतियों और सरकारों की नीयत पर रचनात्मक चर्चाएं कम होती हैं; इसके विपरीत नारेबाजी, तख्तियां लहराना, वेल में आकर प्रदर्शन करना और कार्यवाही को बार-बार बाधित करना एक आम चलन बन गया है।

एक कड़वी हकीकत: हमें यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि संसद का प्रत्येक मिनट देश की जनता की गाढ़ी कमाई (टैक्स) के पैसे से चलता है। इसलिए, सदन का एक भी सत्र यदि बिना किसी कामकाज के अनुत्पादक बीत जाता है, तो वह केवल एक संसदीय विफलता नहीं है, बल्कि देश के बहुमूल्य लोकतांत्रिक संसाधनों का सरासर दुरुपयोग है।

2. ज्वलंत मुद्दे और सत्ता-विपक्ष की दोहरी जिम्मेदारी

इस बार भी विपक्ष के तरकश में सरकार को घेरने के लिए कई तीखे तीर मौजूद हैं। देश में प्रतियोगी परीक्षाओं में सामने आई कथित अनियमितताएं, शिक्षा व्यवस्था की चुनौतियां, महंगाई, बेरोजगारी, विदेश नीति, सीमा सुरक्षा, धार्मिक स्थलों के विवाद, टैक्स स्ट्रक्चर और चुनावी प्रक्रिया जैसे विषय निश्चित रूप से राष्ट्रीय महत्व के हैं।

इन विषयों पर संसद में तीखे सवाल पूछे जाने चाहिए, क्योंकि स्वस्थ लोकतंत्र में विपक्ष सरकार की आंख और कान दोनों होता है। लेकिन यदि ये गंभीर विषय सिर्फ और सिर्फ राजनीतिक नारेबाजी और हेडलाइंस बटोरने का जरिया बनकर रह जाएं, तो इनका मूल उद्देश्य ही समाप्त हो जाता है।

दोनों पक्षों के लिए आवश्यक दृष्टिकोण:

  • विपक्ष का दायित्व: केवल अंधविरोध या हर बात पर बहिष्कारों की राजनीति करने के बजाय सरकार को बेहतर और अधिक लोककल्याणकारी निर्णय लेने के लिए बाध्य करना तथा वैकल्पिक नीतियां व ठोस सुझाव सामने रखना।

  • सरकार का कर्तव्य: केवल अपने प्रचंड बहुमत के अहंकार में चूर होकर निर्णयों को थोपना नहीं, बल्कि विपक्ष के हर तार्किक प्रश्न का पूरी संवेदनशीलता और तथ्यात्मक स्पष्टता के साथ उत्तर देना तथा संवाद का एक सौहार्दपूर्ण वातावरण तैयार करना।

3. राष्ट्रहित बनाम दलगत राजनीति

संसद के भीतर होने वाली बहस तब सार्थक कही जाएगी, जब उससे देश के आखिरी व्यक्ति के कल्याण की कोई राह निकले। यदि इस सत्र में शिक्षा व्यवस्था पर चर्चा हो, तो उसका केंद्र बिंदु छात्रों का उज्जवल भविष्य होना चाहिए, न कि दलों का वोटबैंक। यदि महंगाई पर बहस हो, तो उसका एकमात्र उद्देश्य आम नागरिक को राहत देने वाली आर्थिक नीतियां बनाना होना चाहिए। राष्ट्रीय सुरक्षा और विदेश नीति जैसे संवेदनशील मामलों पर दलगत राजनीति को पूरी तरह दरकिनार कर केवल और केवल राष्ट्रहित को सर्वाेपरि रखा जाना चाहिए।

पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने एक बार बड़ी सटीक बात कही थी कि—“संसद को सुचारू रूप से चलाना ही लोकतंत्र की वास्तविक कसौटी है।” जब असहमति का स्थान हठधर्मिता ले लेती है और बहस की जगह केवल बहिष्कार हावी हो जाता है, तब लोकतंत्र की आत्मा आहत होती है। संसद का ठप होना किसी एक राजनीतिक दल की जीत या हार नहीं है, बल्कि वह पूरे देश और लोकतांत्रिक मूल्यों की सामूहिक हार है।

4. मतदाता सजग है: प्रतीकात्मक राजनीति का अंत

आज का युग सूचना क्रांति का युग है, जहाँ लाइव प्रसारण के माध्यम से देश का हर नागरिक और मतदाता अपने जनप्रतिनिधियों के आचरण को लाइव देख रहा है। जनता भली-भांति समझती है कि कौन सा सांसद सचमुच जनहित के प्रश्न उठा रहा है और कौन केवल टीवी कैमरों के लिए राजनीतिक प्रदर्शन कर रहा है।

दार्शनिक और पूर्व राष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने कहा था कि—“संसद राष्ट्र के विवेक की आवाज होती है।” यदि यही सामूहिक विवेक सदन के भीतर के शोरगुल में कहीं खो जाए, तो लोकतंत्र का मार्ग निश्चित रूप से धुंधला पड़ जाता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

Q1. लोकतंत्र में विपक्ष की सबसे आदर्श और रचनात्मक भूमिका क्या होनी चाहिए?

उत्तर: एक आदर्श लोकतंत्र में विपक्ष की भूमिका केवल सरकार की हर नीति का अंधविरोध करना नहीं है। विपक्ष का मुख्य कार्य सरकार को जनता के प्रति जवाबदेह बनाना, जनहित के मुद्दों को शालीनता व तर्कों के साथ उठाना और सरकार की कमियों को उजागर करते हुए बेहतर नीतियां बनाने के लिए रचनात्मक सुझाव देना है।

Q2. संसद की कार्यवाही बार-बार स्थगित होने से देश का क्या नुकसान होता है?

उत्तर: संसद की कार्यवाही बाधित होने से सबसे पहला नुकसान देश के करदाताओं के पैसों का होता है, क्योंकि संसद चलाने की प्रति मिनट की लागत बहुत अधिक होती है। दूसरा और सबसे बड़ा नुकसान यह होता है कि जनहित से जुड़े कई महत्वपूर्ण कानून और नीतियां अटक जाती हैं, जिससे देश का विकास प्रभावित होता है।

Q3. ‘संसद राष्ट्र के विवेक की आवाज़ है’—इस कथन का क्या तात्पर्य है?

उत्तर: इस कथन का अर्थ है कि विभिन्न विचारधाराओं और क्षेत्रों से चुनकर आए जनप्रतिनिधि जब दलगत राजनीति से ऊपर उठकर केवल राष्ट्र के कल्याण और न्याय के लिए सामूहिक विचार-विमर्श करते हैं, तो वह निर्णय पूरे देश की सामूहिक बुद्धिमत्ता और विवेक का प्रतीक बनता है।

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