सेहत भी और तगड़ी आमदनी भी: झाबुआ के थांदला में कृषि सखियों और किसानों से सीएम मोहन यादव ने जाना ‘प्राकृतिक खेती’ का सच!

Jhabua Prakritik Kheti Mohan Yadav Samvad
मध्य प्रदेश के जनजातीय बाहुल्य झाबुआ जिले की धरती अब केवल पारंपरिक खेती का केंद्र नहीं रही, बल्कि यह पूरे प्रदेश के लिए ‘प्राकृतिक और जैविक खेती’ (Natural & Organic Farming) का सबसे बड़ा रोल मॉडल बनकर उभर रही है। शुक्रवार (31 जुलाई 2026) को मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव झाबुआ जिले के थांदला में आयोजित प्रदेश स्तरीय “स्व-सहायता समूहों का क्षमतावर्धन एवं ऋण वितरण कार्यक्रम” में शामिल हुए.
कार्यक्रम के दौरान मुख्यमंत्री ने किसी औपचारिक मंच की सीमा में बंधने के बजाय खुद पांडाल में नीचे आकर प्राकृतिक खेती कर रहीं उन्नतशील कृषि सखियों (Krishi Sakhis) और प्रगतिशील किसानों के पास बैठकर उनसे सीधा संवाद किया. उन्होंने प्राकृतिक तकनीकों, बीजामृत-जीवामृत बनाने की विधि और खेती से हो रही आमदनी का पूरा हिसाब-किताब जाना.
1. 125 किसानों की गुरु बनीं कृषि सखी संगीता डामोर: गेहूँ का उत्पादन 35 से बढ़कर 45 क्विंटल पहुँचा!
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने विकासखंड मेघनगर के ग्राम देवीगढ़ की रहने वाली उन्नतशील कृषि सखी श्रीमती संगीता डामोर से उनके अनुभवों की जानकारी ली.
कृषि सखी की सफलता की गाथा:
5 दिवसीय ट्रेनिंग: संगीता जी ने बताया कि उन्होंने कृषि सखी के रूप में प्राकृतिक खेती का 5 दिनों का विशेष प्रशिक्षण लिया है.
125 किसानों को ट्रेनिंग: आज वे अपने गाँव और आसपास के 125 किसानों को खुद ट्रेनिंग देकर बीजामृत, जीवामृत और नीमास्त्र जैसे प्राकृतिक खाद व कीटनाशक बनाना सिखा रही हैं.
उत्पादन में बंपर बढ़ोतरी: पिछले 4 वर्षों से ‘आत्मा परियोजना’ से जुड़कर 1 हेक्टेयर ज़मीन पर प्राकृतिक खेती कर रहीं संगीता जी ने बताया कि सही फसल प्रबंधन से उनके खेत में गेहूँ की पैदावार 35 क्विंटल से बढ़कर 45 क्विंटल प्रति हेक्टेयर हो गई है, जिससे उनकी आय में जबरदस्त बढ़ोतरी हुई है.
2. ₹50 हज़ार कमाने वाले किसान विमल भाबोर की कमाई अब ₹1.5 लाख के पार!
झाबुआ विकासखंड के ग्राम खेड़ी निवासी प्रगतिशील किसान श्री विमल भाबोर की कहानी यह साबित करती है कि अगर इंसान आधुनिक और प्राकृतिक तकनीक अपनाए, तो खेती कभी घाटे का सौदा नहीं बन सकती.
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किसान विमल भाबोर की आय और जैव संसाधन केंद्र (BRC) का ब्योरा
| आय का माध्यम / स्रोत | पहले स्थिति (पारंपरिक खेती) | अब स्थिति (प्राकृतिक व जैविक खेती) |
| वार्षिक मुख्य कृषि आय | ₹50,000 प्रतिवर्ष | ₹1.00 लाख से ₹1.50 लाख प्रतिवर्ष |
| जैव संसाधन केंद्र (BRC) | शून्य | ₹5,500 (जीवामृत-बीजामृत बेचकर) |
| नर्सरी व्यवसाय (Nursery) | शून्य | ₹1.50 लाख की अतिरिक्त कमाई |
| प्राकृतिक फल व सब्जियां | शून्य | ₹1.60 लाख की बिक्री |
| वर्मी कम्पोस्ट खाद | शून्य | ₹6,000 की खाद बिक्री |
विमल भाबोर ने राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन के तहत अपने खेत पर जैव संसाधन केंद्र (Bio Resource Centre) स्थापित किया है, जहाँ से वे आसपास के दर्जनों किसानों को भी प्राकृतिक खाद और दवाइयां उपलब्ध करा रहे हैं.
3. झाबुआ में प्राकृतिक खेती के सबसे बेहतरीन अवसर: सीएम यादव
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने संवाद के दौरान कहा कि झाबुआ की उपजाऊ मिट्टी और यहाँ के किसानों की मेहनत प्राकृतिक खेती के लिए सबसे बेहतर माहौल तैयार करती है.
कृषक कल्याण वर्ष: प्रदेश में मनाए जा रहे ‘कृषक कल्याण वर्ष 2026’ के तहत किसानों की लागत कम करने, मिट्टी की उर्वरता (Soil Fertility) बनाए रखने और रासायनिक उर्वरकों के बिना स्वस्थ अनाज उगाने के लिए कई योजनाएं चलाई जा रही हैं.
रक्षाबंधन की शुभकामनाएँ: मुख्यमंत्री ने झाबुआ की सभी जनजातीय बहनों और कृषि सखियों को आने वाले रक्षाबंधन पर्व की अग्रिम बधाई दी.
समारोह में प्रदेश के प्रभारी मंत्री श्री विजय शाह, महिला एवं बाल विकास मंत्री सुश्री निर्मला भूरिया, संभागायुक्त श्री भास्कर लक्षकार, आईजी श्री अनुराग, कलेक्टर डॉ. योगेश तुकाराम भरसट और एसपी श्री देवेंद्र पाटीदार सहित कई गणमान्य नागरिक मौजूद रहे.
अंतिम विचार
झाबुआ के थांदला से आई यह ज़मीनी रिपोर्ट यह साबित करती है कि जब सरकार की योजनाएं और गाँव की ‘कृषि सखियाँ’ एक साथ मिलकर काम करती हैं, तो बदलाव सिर्फ कागज़ों पर नहीं बल्कि किसानों की जेब में दिखता है। संगीता डामोर और विमल भाबोर जैसे किसानों ने यह दिखा दिया है कि प्राकृतिक खेती अपनाकर न केवल ज़मीन और सेहत को बचाया जा सकता है, बल्कि अपनी कमाई को भी दोगुना से तीन गुना किया जा सकता है!
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)
Q1. झाबुआ के थांदला में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने किस कार्यक्रम में भाग लिया?
मुख्यमंत्री ने थांदला में आयोजित प्रदेश स्तरीय “स्व-सहायता समूहों का क्षमतावर्धन एवं ऋण वितरण कार्यक्रम” में भाग लिया और कृषि सखियों से संवाद किया.
Q2. प्राकृतिक खेती में ‘बीजामृत’ और ‘जीवामृत’ क्या हैं?
बीजामृत और जीवामृत पूरी तरह प्राकृतिक और जैविक मिश्रण हैं, जिन्हें गोबर, गोमूत्र, बेसन, गुड़ और मिट्टी से तैयार किया जाता है। यह बीजों के अंकुरण और मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने का काम करते हैं.
Q3. कृषि सखी संगीता डामोर को प्राकृतिक खेती से क्या लाभ हुआ?
प्राकृतिक खेती अपनाने से उनकी फसल की लागत कम हुई और गेहूँ का उत्पादन 35 क्विंटल से बढ़कर 45 क्विंटल प्रति हेक्टेयर हो गया, जिससे उनकी आय में उल्लेखनीय वृद्धि हुई.
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