
शाजापुर। मध्य प्रदेश के शाजापुर शहर से एक हैरान करने वाला मामला सामने आया है। शहर के बीचों-बीच स्थित पॉश इलाका ‘आरके पुरम कॉलोनी’ इन दिनों स्थानीय निवासियों के बीच चर्चा का केंद्र बना हुआ है। दरअसल, यहाँ एक व्यावसायिक निर्माण को लेकर स्थानीय लोगों ने सरकारी भूमि, पुराने पेड़ों और सार्वजनिक नाले से जुड़े कई गंभीर सवाल उठाए हैं। मामला प्रशासन की चौखट तक पहुँच चुका है और क्षेत्र के लोग अब इस पूरे घटनाक्रम की निष्पक्ष जाँच की माँग कर रहे हैं।
क्या है पूरा मामला?
स्थानीय सूत्रों और निवासियों से मिली जानकारी के अनुसार, आरके पुरम कॉलोनी के एक हिस्से में इन दिनों एक बड़े व्यावसायिक परिसर का निर्माण कार्य चल रहा है। इस निर्माण को लेकर स्थानीय लोगों का दावा है कि जिस जगह पर आज यह भव्य इमारत खड़ी है, वहाँ कभी पर्यावरण और जन-सुविधा से जुड़े महत्वपूर्ण संसाधन मौजूद थे।
इस मामले में मुख्य रूप से तीन बड़े बिंदु सामने आए हैं, जो प्रशासनिक प्रक्रिया पर सवाल खड़े करते हैं:
- सौ साल पुराने पेड़ों की कटाई का आरोप: स्थानीय लोगों का कहना है कि सर्वे नंबर 19 में स्थित दो बेहद पुराने और विशालकाय इमली के पेड़ों को कथित तौर पर बिना किसी वैध अनुमति के काट दिया गया। जब पर्यावरण प्रेमियों ने इस पर आपत्ति जताई, तो इसे सिर्फ ‘पेड़ों की छंटाई’ कहकर टालने का प्रयास किया गया।
- सरकारी नाले और नल भूमि का अस्तित्व: निवासियों का आरोप है कि परिसर के निर्माण के दौरान वहाँ से गुजरने वाले एक सरकारी नाले को बंद कर दिया गया। इसके साथ ही, सर्वे नंबर 1, 2 और 4 की सरकारी नल भूमि को भी इस परिसर में शामिल किए जाने के दावे किए जा रहे हैं। हालांकि, इन दावों की आधिकारिक और स्वतंत्र पुष्टि होना अभी बाकी है।
- रजिस्ट्री और वास्तविक क्षेत्रफल में बड़ा अंतर: उपलब्ध दस्तावेज़ों के मुताबिक, इस ज़मीन की रजिस्ट्री करीब 4,250 वर्ग फीट के लिए दर्शाई गई है। लेकिन चौंकाने वाली बात यह है कि स्थानीय लोगों के अनुसार, मौके पर बने परिसर का वास्तविक क्षेत्रफल लगभग 7,500 वर्ग फीट के आसपास दिखाई देता है। रजिस्टर्ड एरिया और वास्तविक निर्माण के बीच का यह बड़ा अंतर ही इस विवाद की मुख्य जड़ बना हुआ है।
प्रशासनिक प्रक्रिया और पटवारी की भूमिका पर सवाल
इस पूरे घटनाक्रम में राजस्व विभाग की कार्यप्रणाली भी चर्चा में है। आम तौर पर पटवारी कृषि भूमि के सीमांकन या नाप की प्रक्रिया से जुड़े होते हैं। ऐसे में स्थानीय निवासियों का सवाल है कि इस व्यावसायिक भूमि की नाप किस आधार पर और किसके निर्देशों पर की गई?
इसके अलावा, मूल भूमि से जुड़े अन्य पक्षकारों का आरोप है कि इस पूरी प्रक्रिया के दौरान उन्हें किसी भी प्रकार का कानूनी नोटिस या पूर्व सूचना नहीं दी गई। चर्चा यह भी है कि यह पूरा मामला फिलहाल न्यायालय में लंबित है, जिसके चलते विवादित स्थल पर जारी निर्माण कार्य को लेकर क्षेत्र में असंतोष बढ़ रहा है।
नगर पालिका का पक्ष: “जाँच के बाद ही कुछ कह पाएंगे”
जब इस संवेदनशील विषय को लेकर नगर पालिका के सीएमओ भूपेंद्र कुमार दीक्षित से संपर्क किया गया और उनसे निर्माण अनुमति के आधारों के बारे में पूछा गया, तो उन्होंने बेहद नपा-तुला जवाब दिया।
सीएमओ ने कहा
इस विषय में वर्तमान में कुछ भी कहना जल्दबाजी होगी। मामले की पूरी जाँच प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही स्थिति स्पष्ट की जा सकेगी।
प्रशासन की ओर से आए इस बयान के बाद स्थानीय जनता के मन में यह सवाल और गहरा गया है कि शहर के मुख्य मार्ग पर हो रहे इतने बड़े निर्माण पर संबंधित विभागों की नज़र समय रहते क्यों नहीं पड़ी।
निष्कर्ष
यह पूरा मामला फिलहाल स्थानीय नागरिकों के दावों, शिकायती पत्रों और प्रशासनिक फाइलों के इर्द-गिर्द घूम रहा है। किसी भी अंतिम निष्कर्ष पर पहुँचने से पहले राजस्व और नगर पालिका विभाग की संयुक्त जाँच रिपोर्ट का इंतज़ार करना होगा। चूंकि यह मामला सार्वजनिक हित और पर्यावरण से जुड़ा हुआ है, इसलिए शाजापुर के नागरिक चाहते हैं कि प्रशासन जल्द से जल्द दूध का दूध और पानी का पानी करे ताकि सच सबके सामने आ सके।
इस मामले से जुड़ी हर अपडेट और जाँच रिपोर्ट की बारीकियों को हम आप तक पहुँचाते रहेंगे। बने रहिए हमारे साथ, इस मामले का अगला खुलासा जल्द…
नोट: इस लेख में प्रकाशित सभी तथ्य और जानकारियां लेखक के निजी स्रोतों पर आधारित हैं। इसकी पूरी जिम्मेदारी लेखक की है, इससे वेबसाइट या वेबसाइट के मालिक का कोई संबंध नहीं है।
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