सिर्फ सुदर्शन चक्र ही नहीं, श्रीकृष्ण के पास थे ये 10 अचूक अस्त्र-शस्त्र; जिनके आगे कोई नहीं टिकता
महाभारत से लेकर कंस वध तक: जानिए कान्हा के उन दिव्य हथियारों के रहस्य, जिन्होंने बदल दिया इतिहास का रुख
Shrikrishna ke Astra Shastra
बचपन से ही हमने टीवी सीरियल्स या पौराणिक कथाओं में भगवान श्रीकृष्ण की जो छवि देखी है, उसमें या तो उनके होठों पर बांसुरी सजी होती है, या फिर उनकी तर्जनी उंगली पर तेजी से घूमता ‘सुदर्शन चक्र’ नजर आता है। सुदर्शन चक्र का खौफ ऐसा था कि इसके नाम भर से ही बड़े-बड़े असुरों के पसीने छूट जाते थे।
लेकिन क्या आप जानते हैं कि 64 कलाओं के ज्ञाता और भगवान विष्णु के आठवें अवतार श्रीकृष्ण के तरकश में सिर्फ सुदर्शन चक्र ही नहीं था? महाभारत के उस दौर में उनके पास ऐसे-ऐसे मारक और अचूक हथियार थे, जिनका सामना करना तीनों लोकों में किसी भी योद्धा के बस की बात नहीं थी।
महाभारत के पन्ने पलटकर देखें तो पता चलता है कि धर्म की स्थापना के लिए कान्हा ने कई अलौकिक शक्तियों का इस्तेमाल किया था। चलिए, एक-एक करके भगवान श्रीकृष्ण के उन 10 सबसे शक्तिशाली अस्त्र-शस्त्रों के बारे में जानते हैं, जो उन्हें सही मायनों में अजेय बनाते थे।
1. अजेय कूटनीति और आध्यात्मिक शक्ति (उनका सबसे बड़ा अस्त्र)
यह सुनकर शायद आप चौंक जाएं, लेकिन श्रीकृष्ण का सबसे खतरनाक हथियार लोहे या किसी धातु का नहीं बना था; वह थी उनकी असीम ‘बुद्धि’। महाभारत के 18 दिन चले महायुद्ध में उन्होंने एक बार भी हथियार नहीं उठाया, फिर भी अपनी रणनीतियों से कौरवों की पूरी की पूरी अक्षौहिणी सेना को धूल चटा दी। कुरुक्षेत्र के मैदान में अर्जुन को दिया गया गीता का ज्ञान निराशा और अज्ञानता को भेदने वाला ऐसा ब्रह्मास्त्र था, जिसने पूरे युद्ध का रुख ही पलट कर रख दिया।
2. पांचजन्य शंख (जिसकी गर्जना से कांपते थे शत्रु)
श्रीकृष्ण जिस शंख को धारण करते थे, उसका नाम ‘पांचजन्य’ था। यह कोई साधारण शंख नहीं था, बल्कि इसे पंच तत्वों का प्रतीक माना जाता है। कहते हैं कि जब कुरुक्षेत्र में भगवान ने अपने होंठों से लगाकर इस शंख का नाद किया था, तो उसकी गूंज से ही कौरव सेना का मनोबल आधा हो गया था। इसकी ध्वनि जहां एक तरफ दुष्टों के मन में खौफ पैदा करती थी, वहीं धर्म के पक्ष में खड़े योद्धाओं की रगों में आग भर देती थी।
3. अभेद्य दिव्य रथ (जैत्र और गरुड़ ध्वज)
आज के समय में जैसे बुलेटप्रूफ और मिसाइल-प्रूफ टैंक होते हैं, द्वापर युग में भगवान कृष्ण का रथ कुछ वैसा ही था। उनके रथ का नाम ‘जैत्र’ था। इस रथ को शैव्य, सुग्रीव, मेघपुष्प और बलाहक नाम के चार चमत्कारी घोड़े खींचते थे। इस रथ की सबसे खास बात इसकी ध्वजा थी, जिस पर साक्षात हनुमान जी (कपिध्वज) विराजमान थे। इसी वजह से बड़े से बड़े आकाशीय अस्त्र भी इस रथ का बाल बांका नहीं कर पाते थे।
4. अचूक मल्ल युद्ध विद्या (नंगे हाथों की ताकत)
भगवान कृष्ण को सिर्फ दूर से अस्त्र चलाने में ही महारत हासिल नहीं थी, बल्कि वो ‘हैंड-टू-हैंड कॉम्बैट’ यानी मल्ल युद्ध के भी उस्ताद थे। उनकी फुर्ती और बाहुबल का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि मथुरा में कंस के सबसे खूंखार पहलवानों—चाणूर और मुष्टिक—को उन्होंने बिना किसी हथियार के, सिर्फ अपने नंगे हाथों से ही मौत के घाट उतार दिया था।
5. ब्रह्मास्त्र (उस युग का परमाणु बम)
श्रीकृष्ण के पास उस युग का सबसे विनाशकारी हथियार ‘ब्रह्मास्त्र’ भी मौजूद था। यह एक ऐसा अचूक दिव्यास्त्र था, जिसमें पूरे ब्रह्मांड को एक झटके में राख कर देने की ताकत थी। स्वयं परब्रह्म होने के नाते, कृष्ण इस अस्त्र को चलाना और उसे वापस लेना, दोनों बखूबी जानते थे।
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6. नारायणास्त्र (कभी न चूकने वाली मिसाइल)
अगर नारायणास्त्र को प्राचीन काल की सबसे ‘स्मार्ट मिसाइल’ कहा जाए, तो यह गलत नहीं होगा। यह अस्त्र इतना बुद्धिमान था कि दुश्मन की ताकत और संख्या के हिसाब से अपना प्रभाव खुद तय कर लेता था। इसकी मार से बचने का कोई तरीका नहीं था, सिवाय इसके कि आप अपने सारे हथियार डालकर इसके सामने नतमस्तक हो जाएं। भगवान कृष्ण इस अस्त्र के भी पूर्ण स्वामी थे।
7. नंदक खड्ग (ज्ञान और शक्ति की तलवार)
श्रीकृष्ण की कमर में एक बेहद खूबसूरत और धारदार तलवार भी सुशोभित होती थी, जिसका नाम ‘नंदक’ (या नंदका) था। शिव पुराण और अन्य कथाओं के अनुसार, देव शिल्पी विश्वकर्मा जी ने इसे भगवान विष्णु को सौंपा था। यह तलवार सिर्फ शरीर नहीं काटती थी, बल्कि यह अज्ञानता और बुराई की जड़ों को काटने का भी प्रतीक मानी जाती है।
8. सारंग धनुष (जिसका लक्ष्य कभी नहीं भटकता)
राम अवतार में जिस तरह भगवान के हाथ में ‘कोदंड’ था, उसी तरह कृष्ण अवतार में उनके पास ‘सारंग’ नाम का एक चमत्कारी धनुष था। इस दिव्य धनुष का निर्माण भी भगवान विश्वकर्मा ने ही किया था। सारंग धनुष से निकला तीर कभी अपना रास्ता नहीं भटकता था और सीधे लक्ष्य को भेद कर ही दम लेता था।
9. कौमोदकी गदा (प्रलयंकारी प्रहार)
जल के देवता वरुण ने खांडव वन के दहन से पहले भगवान कृष्ण को यह विशेष गदा भेंट की थी। जब कौमोदकी गदा से प्रहार किया जाता था, तो आसमान में बादलों के गरजने जैसी भयंकर आवाज गूंज उठती थी। यह गदा समय, ज्ञान और परम शक्ति का प्रतीक थी, जो रास्ते में आने वाली हर भौतिक और आध्यात्मिक बाधा को चूर-चूर कर सकती थी।
10. सुदर्शन चक्र (ब्रह्मांड का सबसे अचूक अस्त्र)
और अंत में, उनका सबसे चहेता और परम शक्तिशाली शस्त्र—सुदर्शन चक्र। भगवान शिव द्वारा श्री हरि को भेंट किया गया यह चक्र ब्रह्मांड का इकलौता ऐसा हथियार था, जो कभी खाली नहीं जाता था। यह पलक झपकते ही शत्रु का सिर धड़ से अलग करता और अपना काम पूरा करके वापस भगवान की तर्जनी उंगली में समा जाता था। इसके प्रहार को रोकने की ताकत तीनों लोकों में किसी के पास नहीं थी।
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