
Howrah Bridge construction story
26,500 टन स्टील, 705 मीटर लंबाई, 457.2 मीटर का मेन स्पैन, 82 मीटर ऊंचा ढांचा। आज भी इस पर हर दिन लगभग 1 लाख व्हीकल्स और 1.5 लाख से ज्यादा पैदल चलने वाले लोग गुजरते हैं। सोचिए 1940 में बना एक पुल और 80 साल से भी ज्यादा समय बाद भी आज एक शहर की धड़कन बना हुआ है। जी हां, हम बात कर रहे हैं हावड़ा ब्रिज की। लेकिन सवाल यह है कि आखिर इस पुल को बनाने की जरूरत क्यों पड़ी? इसे कैसे बनाया गया? क्या सच में इसमें नट्स एंड बोल्ट्स का इस्तेमाल नहीं हुआ? क्या इसमें कभी जंग नहीं लगता? और आखिर यह पुल इतना आइकॉनिक कैसे बन गया?
हावड़ा ब्रिज की कहानी 19वीं सदी से शुरू होती है। जब कोलकाता ब्रिटिश राज का सबसे बड़ा केंद्र था। 1772 से 1911 तक कोलकाता जो कि आज का कोलकाता है ब्रिटिश इंडिया की राजधानी रहा और उसके बाद भी यह भारत के सबसे बड़े पोर्ट सिटी और कमर्शियल हब्स में शामिल रहा। शहर तेजी से बढ़ रहा था। व्यापार बढ़ रहा था। हावड़ा साइड पर रेलवे कनेक्टिविटी मजबूत हो रही थी और हुगली नदी के दोनों किनारों के बीच रोजाना लोगों और माल की आवाजाही लगातार बढ़ती जा रही थी।
एक तरफ कोलकाता दूसरी तरफ हावड़ा और बीच में बहती हुगली नदी। तो सवाल उठता है कि उस समय लोग नदी पार कैसे करते थे? शुरुआती समय में लोग बोर्स और फेरीज की मदद से नदी पार करते थे। लेकिन जैसे-जैसे पॉपुलेशन बढ़ी, व्यापार बढ़ा और ट्रांसपोर्ट की जरूरत बढ़ी, यह तरीका काफी नहीं रहा। यही वजह थी कि ब्रिटिश सरकार ने एक स्थाई क्रॉसिंग के बारे में सोचना शुरू किया। और फिर 1874 में यहां एक पोंटून ब्रिज बनाया गया।
पोंटून ब्रिज क्या था? हावड़ा ब्रिज बनने से पहले जो पुल था वह आज की तरह स्टील का परमानेंट ब्रिज नहीं था। वो था एक पोंून ब्रिज यानी एक फ्लोटिंग स्ट्रक्चर। मतलब एक ऐसा पुल जो पानी पर तैरते हुए ढांचों के ऊपर बनाया गया था। उस समय के लिए यह एक प्रैक्टिकल सॉल्यूशन था। लेकिन प्रॉब्लम यह थी कि जैसे-जैसे ट्रैफिक बढ़ रहा था, पोंटून ब्रिज पर दबाव भी बढ़ने लगा। इसके अलावा नदी में जहाजों की आवाजाही भी होती थी।
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इसलिए इस तरह के फ्लोटिंग ब्रिजेस की लिमिटेशंस साफ दिखने लगी थी। हावड़ा ब्रिज की प्लानिंग। 20वीं सदी की शुरुआत तक यह लगभग तय हो चुका था कि कोलकाता और हावड़ा के बीच एक नया पुल बनाना जरूरी है। लेकिन हुगली नदी के ऊपर ब्रिज बनाना आसान काम नहीं था। क्योंकि यह एक सामान्य नदी नहीं थी। इसमें ज्वार भाटा यानी हाई टाइड्स का असर होता था। पानी का फ्लो भी स्ट्रांग था और सबसे बड़ी बात यहां बड़े-बड़े जहाज भी गुजरते थे।
तो इंजीनियर्स के सामने चैलेंज था कि पुल मजबूत हो। बीच नदी में ज्यादा रुकावट ना हो। शिपिंग ट्रैफिक प्रभावित ना हो और पुल पर भारी लोड भी आसानी से चल सके। इन्हीं चैलेंजेस को देखते हुए एक खास डिजाइन चुना गया। कैंटलवर ब्रिज डिज़। अब आप सोच रहे होंगे कि कैंटीिलवर ब्रिज आखिर होता क्या है? सिंपल लैंग्वेज में समझे तो कैंटीिलवर ब्रिज एक ऐसा पुल होता है जिसमें दोनों किनारों से स्ट्रक्चर बाहर की तरफ बढ़ता है और बीच का हिस्सा सपोर्ट करता है।
बिना बीच नदी में पिलर लगाए। यानी यह पुल एक तरह से दोनों किनारों से बंधा हुआ होता है। हावड़ा ब्रिज की सबसे बड़ी इंजीनियरिंग खासियत यही थी। इस ब्रिज को इस तरह डिजाइन किया गया था कि हुगली नदी के मुख्य जलमार्ग के बीच में कोई भी पिलर या बाधा ना आए। इससे नदी में शिप्स की मूवमेंट आसान बनी रही। यही वजह है कि यह पुल सिर्फ एक ट्रांसपोर्ट स्ट्रक्चर नहीं बल्कि इंजीनियरिंग का भी एक अद्भुत उदाहरण माना जाता है।
इसका मेन स्पैन 457.2 मीटर है और कमीशनिंग के समय यह दुनिया का तीसरा सबसे लंबा कैंटीिलवर ब्रिज था। कंस्ट्रक्शन कब शुरू हुआ? हावड़ा ब्रिज के कंस्ट्रक्शन की प्रक्रिया कई सालों की प्लानिंग, डिस्कशन और इंजीनियरिंग कैलकुलेशंस के बाद आगे बढ़ी। इसके लिए हावड़ा ब्रिज कमीशन बनाया गया। हावड़ा ब्रिज का डिजाइन एक ब्रिटिश कंसल्टिंग फर्म रेंडल पामियर एंड ट्रिटन ने तैयार किया था और डिजाइन से जुड़े इंजीनियर मिस्टर वाल्टन का नाम विशेष रूप से दर्ज है।
फैब्रिकेशन और इरेक्शन का काम ब्रेथवेट बर्न एंड जेसब कंस्ट्रक्शन कंपनी ने संभाला। इसके एग्जीक्यूशन में भारतीय इंडस्ट्रियल स्ट्रेंथ और इंजीनियरिंग फर्म्स की भी बड़ी भूमिका थी। अंततः नए ब्रिज के निर्माण का रास्ता साफ हुआ और 1930 में इस प्रोजेक्ट ने रियल फॉर्म लेना शुरू किया। ब्रिज का एक्चुअल कंस्ट्रक्शन 1936 के आसपास शुरू हुआ। यह समय आसान नहीं था। दुनिया पॉलिटिकल टेंशन से भरी हुई थी और कुछ ही सालों में सेकंड वर्ल्ड वॉर भी शुरू हो गया।
पुल 1942 से 43 के आसपास ऑपरेशनल फॉर्म में आ गया। उस समय यह सिर्फ एक ट्रांसपोर्ट ब्रिज नहीं था बल्कि स्ट्रेटेजिकेंस भी रखता था। कोलकाता उस दौर में ब्रिटिश इंडिया का बहुत महत्वपूर्ण शहर था। वॉर लॉजिस्टिक्स, ट्रेड मूवमेंट और सिविलियन कनेक्टिविटी इन सबके लिए यह पुल बेहद अहम था। हावड़ा ब्रिज कैसे बना? हावड़ा ब्रिज के निर्माण में करीब 26,000 टन से ज्यादा स्टील का इस्तेमाल हुआ था। इस स्टील का बड़ा हिस्सा भारतीय स्टील इंडस्ट्री खासकर टाटा स्टील से आया था।
यह उस समय भारत की इंडस्ट्रियल कैपेबिलिटी का एक बड़ा प्रमाण था। सबसे रोचक बात यह है कि इस पुल को जोड़ने में ट्रेडिशनल नट्स एंड बोल्ट्स का इस्तेमाल लगभग नहीं किया गया। इसके बजाय इसे रिवेट्स की मदद से जोड़ा गया। इस ब्रिज में कुल 26,500 टन स्टील का इस्तेमाल हुआ था। इनमें से लगभग 23,000 टन हाई टेंसाइल एलॉय स्टील जिसे टिस्रोम कहा गया। टाटा स्टील ने सप्लाई किया। टाटा स्टील के अपने रिकॉर्ड के अनुसार ब्रिज में इस्तेमाल स्टील का लगभग 90% हिस्सा भारत में बना था।
यही कारण है कि हावड़ा ब्रिज को कई लोग इंडिपेंडेंस से पहले भारत की इंडस्ट्रियल कैपेबिलिटी का एक बड़ा सिंबल मानते हैं। हावड़ा ब्रिज की टोटल लेंथ 705 मीटर है। इसकी विड्थ 21.6 मीटर है और दोनों ओर लगभग 4.6 मीटर के फुटपाथ्स हैं। मेन स्पैन 457.2 मीटर है। वहीं स्ट्रक्चर की हाइट लगभग 82 मीटर तक जाती है। यह ब्रिज सिक्स लेंस कैरी करता है और इस पर टोल नहीं लिया जाता। अब सबसे महत्वपूर्ण सवाल इतने साल पुराना स्टील ब्रिज आज भी कैसे खड़ा है? क्या इसमें जंग नहीं लगता? सच यह है कि जंग लगता है।
कोरोजन होता है। ह्यूमिडिटी, पोल्यूशन और लोड सब असर डालते हैं। लेकिन इसकी लजिविटी का राज है हाई टेंसाइल स्टील, रिवेटेड कंस्ट्रक्शन, इंटेलिजेंट लोड डिस्ट्रीब्यूशन और लगातार इंस्पेक्शन तथा मेंटेनेंस। जब यह पुल कमीशंड हुआ तब इसे न्यू हावड़ा ब्रिज कहा गया। क्योंकि इसने पुराने पोंटून ब्रिज की जगह ली थी।
बाद में 14 जून 1965 को इसका ऑफिशियल नाम बदलकर रविंद्र सेतु रखा गया। रविंद्र नाथ टैगोर के सम्मान में। लेकिन पब्लिक मेमोरी में यह आज भी हावड़ा ब्रिज ही बना हुआ है। हावड़ा ब्रिज को कोलकाता के एक सिंबल के रूप में देखा जाता है। जिस तरह आईफिल टावर पेरिस की पहचान है, उसी तरह हावड़ा ब्रिज कोलकाता की विजुअल आइडेंटिटी बन चुका है।
इस पूरे प्रोजेक्ट की कॉस्ट लगभग ₹2.5 करोड़ आई थी जो उस दौर के हिसाब से बेहद बड़ी रकम थी। हावड़ा ब्रिज सिर्फ एक पुल नहीं है। यह 19वीं सदी की जरूरत, 20वीं सदी की इंजीनियरिंग और आज के कोलकाता शहर की धड़कन का संगम है। समय बदला, दौर बदले, लेकिन यह पुल आज भी उतनी ही मजबूती से खड़ा है।
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