
अंटार्कटिका – आज हम बात करने वाले हैं अंटार्कटिका के सबसे खतरनाक रहस्यों के बारे में। यह जगह इतनी खतरनाक है कि यहां कभी धूप नहीं लगती। अगर किसी को इस जगह के बीचों-बीच छोड़ दिया जाए, तो वही पल उसके लिए अंतिम यादगार होगा। अंटार्कटिका कितना खतरनाक है, आप इस बात से समझ सकते हैं कि अमेज़ॉन जंगल इसके सामने कुछ भी नहीं है। वहां तो कम से कम कीमकोड़े, पेड़-पौधे और प्राकृतिक साधन मिल जाते हैं।
लेकिन यहां आपके हाथ में ठंड और बर्फ के अलावा कुछ भी नहीं मिलता। यहां की ठंड इतनी भीषण है कि आपका खून और हड्डियां तक जम जाती हैं। लोग यहां मौत से हाथ धोने से पहले ही ठंड में जम जाते हैं। यहां खाने का कोई साधन नहीं। कोई जीव-जंतु नहीं, ना कोई पेड़-पौधा। बस आपका इंतजार करती है कि कब आप सो जाएं और बर्फ हमेशा के लिए आपको ढक दे।
यह है अंटार्कटिका, दुनिया का सबसे बड़ा और सबसे ठंडा महाद्वीप। वैज्ञानिकों के अनुसार अंटार्कटिका का निर्माण लगभग 3 करोड़ 40 लाख वर्ष पहले हुआ था। यानी यह धरती के सबसे प्राचीन और रहस्यमयी हिस्सों में से एक है, जिसने करोड़ों वर्षों से अपने भीतर असंख्य राज छुपा रखे हैं।
अंटार्कटिका को पहली बार इंसानों ने 1821 ईसवी में खोजा था, और इसे सबसे पहले जिस व्यक्ति ने अपने कदमों से छुआ उनका नाम था जॉन डेविस। उस दौर में जहाज से यात्रा करना भी एक बड़ा जोखिम था, और इतनी ठंडी जगह पर उतरना लगभग मौत को दावत देने जैसा था। लेकिन इसी साहस की वजह से दुनिया को इस महाद्वीप का पता चला।
अब इसके आकार को समझिए। अंटार्कटिका इतना विशाल है कि इसके ऊपर अगर भारत जैसा देश चार बार रख दिया जाए और पाकिस्तान जैसा देश 15 बार रख दिया जाए, तब जाकर यह पूरा महाद्वीप भर पाएगा। यानी सोचिए एक तरफ सिर्फ एक देश भारत है और दूसरी तरफ पूरा अंटार्कटिका है। तो यह तुलना अपने आप में बताती है कि यह महाद्वीप कितना अद्भुत और विशाल है। लेकिन इसका असली रहस्य केवल इसके फैलाव में नहीं बल्कि इसकी गहराई में भी छिपा है।
यहां की बर्फ की परत औसतन 2.16 किमी मोटी है और कई जगहों पर यह 4.7 किमी तक पहुंच जाती है। इसका मतलब क्या हुआ? अगर आप दुनिया की सबसे ऊंची इमारत बुर्ज खलीफा (828 मीटर) को लें और उसे एक के ऊपर एक खड़ा करें तो आपको कम से कम पांच खलीफा लगाने पड़ेंगे। तभी जाकर अंटार्कटिका की बर्फ की गहराई का अंदाजा लगाया जा सकता है। इतनी मोटी बर्फ दुनिया के किसी और हिस्से में नहीं है।
अब बात करते हैं यहां की ठंड की। जब दुनिया के कई हिस्सों में गर्मियों के मौसम में तापमान 40 से 45 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है, तब भी अंटार्कटिका की गर्मियों का औसत तापमान केवल -30 डिग्री सेल्सियस होता है, और सर्दियों में तो हाल और भी भयानक हो जाता है जब तापमान गिरकर -80 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है। इतनी ठंड की कल्पना करना भी मुश्किल है। इंसान अगर बिना सुरक्षा के यहां कुछ ही मिनट खड़ा रहे तो उसका पूरा शरीर जमकर बर्फ का पुतला बन सकता है।
लेकिन केवल ठंड ही नहीं, अंटार्कटिका के तूफान भी उतने ही खतरनाक हैं। यहां की हवाएं कभी-कभी 200 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से चलती हैं। यह ताकत इतनी ज्यादा है कि भारी-भरकम सामान भी उड़ सकता है और बड़े-बड़े वैज्ञानिक केंद्र तक हिल जाते हैं। आम तूफान और अंटार्कटिका के तूफान में वही फर्क है जो साधारण हवा और बवंडर में होता है। इतनी ठंड और खतरनाक तूफानों के बावजूद अंटार्कटिका को धरती का सबसे बड़ा बर्फीला खजाना कहा जाता है।
यहां पर पूरी दुनिया की 90% बर्फ मौजूद है और धरती के ताजे पानी का लगभग 70% हिस्सा इसी महाद्वीप के पास है। वैज्ञानिक कहते हैं कि अगर कभी यह पूरी बर्फ पिघल जाए तो समुद्र का स्तर करीब 60 मीटर तक बढ़ जाएगा। सोचिए तब न्यूयॉर्क, मुंबई, लंदन और टोक्यो जैसे बड़े-बड़े शहर पूरी तरह से पानी में डूब जाएंगे। और अब सवाल आता है कि जब दुनिया में इतनी गर्मी बढ़ रही है तब भी यहां की बर्फ क्यों नहीं पिघल रही? इसका कारण है सूरज की किरणें।
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यहां सूरज की किरणें बहुत कम कोण पर पड़ती हैं और बर्फ की चमकदार सतह उन किरणों को वापस अंतरिक्ष में लौटा देती है। यही कारण है कि अंटार्कटिका करोड़ों सालों से बर्फ से ढका हुआ है और अभी तक अपनी पहचान बनाए हुए है। आगे तो हमने अंटार्कटिका के बारे में कुछ चौंकाने वाली बातें जान ली। लेकिन अब हम जानेंगे अंटार्कटिका के कुछ ऐसे रहस्य के बारे में जिनके बारे में सुनकर वैज्ञानिकों का होश उड़ गया।
सबसे पहले बात करते हैं उन अजीब और लंबी इंसान जैसी खोपड़ियों की जो वैज्ञानिकों को 2014 में अंटार्कटिका के एक पुराने बर्फीले क्षेत्र में मिली। यह खोपड़ी अंटार्कटिका में मिलने वाला पहला इंसानी अवशेष थी। इसे देखकर ऐसा लगता है कि यह कोई सामान्य इंसान नहीं था। इसका मस्तिष्क वाला हिस्सा बहुत ऊपर और लंबा था और दिखने में यह लगभग एलियंस जैसी खोपड़ी लगती थी। वैज्ञानिकों ने इस खोपड़ी पर कई सालों तक गहन अध्ययन किया।
कार्बन डेटिंग और अन्य परीक्षणों से पता चला कि यह खोपड़ी लगभग 150 हजार साल पुरानी थी। हजारों साल पहले अंटार्कटिका में मानव सभ्यता रहती थी। लेकिन यह खोपड़ी स्पष्ट रूप से साधारण मानव से अलग और अजीब थी। जांच के दौरान यह भी सामने आया कि इस खोपड़ी का आकार और बनावट प्राचीन मिस्र के लोगों की खोपड़ियों जैसी थी। यानी प्राचीन मिस्र वासियों के खोपड़ी का आकार भी ऐसा ही हुआ करता था। लेकिन यह खोपड़ी मिस्र से भी पुरानी थी।
इसका मतलब यह हो सकता है कि अंटार्कटिका में पहले मिस्र जैसी मानव सभ्यता रही होगी और समय के साथ बढ़ती ठंड और कठिन मौसम के कारण लोग अन्य सुरक्षित और गर्म क्षेत्रों की ओर चले गए। और यहीं पर जुड़ता है दूसरा रहस्य। 2016 में वैज्ञानिकों ने सैटेलाइट तस्वीरों के माध्यम से अंटार्कटिका के किसी हिस्से में पिरामिड जैसी संरचना देखी। यह पिरामिड लगभग 200 मीटर लंबा और पिरामिड के बराबर ऊंचा था।
अमेरिकी और यूरोपीय वैज्ञानिकों ने इसका अध्ययन किया और बताया कि यह संरचना मानव निर्मित है या प्राकृतिक संरचना जो पिरामिड जैसी दिखती है। यह अब भी पूरी तरह स्पष्ट नहीं हो पाया। इस पिरामिड और खोपड़ी दोनों रहस्य यह संकेत देते हैं कि अंटार्कटिका में हजारों या लाखों साल पहले मानव सभ्यता मौजूद थी। पिरामिड जैसी संरचना और अद्भुत खोपड़ी यह बताती है कि यह जगह कभी विकसित और संरचित समाज की भूमि रही होगी।
समय के साथ बढ़ती ठंड और कठोर मौसम ने इस सभ्यता को दूरस्थ और गर्म क्षेत्रों की ओर जाने के लिए मजबूर किया। वही जगह जहां कभी मानव रहते थे, आज वैज्ञानिकों के लिए रहस्य और खोज का केंद्र बनी हुई है। अंटार्कटिका की बर्फ सिर्फ पुरानी सभ्यताओं या रहस्यमई ढांचों को ही नहीं छुपाए बैठी है, बल्कि इसमें छुपा है अंतरिक्ष का इतिहास। जी हां, यहां की जमी हुई बर्फ के नीचे वैज्ञानिकों को अब तक 45,000 से भी ज्यादा उल्कापिंड मिले हैं।
इस रहस्य की सबसे बड़ी खासियत यह है कि अंटार्कटिका की सफेद बर्फीली सतह पर जब काले पत्थर जैसे उल्कापिंड गिरते हैं तो वे साफ नजर आ जाते हैं। साथ ही यहां की ठंडी और सूखी जलवायु इन उल्कापिंडों को हजारों लाखों साल तक संरक्षित रखती है। वैज्ञानिकों ने 1969 में पहली बार यहां बड़े पैमाने पर उल्कापिंडों की खोज शुरू की थी। उसके बाद से लेकर आज तक उन्हें ऐसे-ऐसे टुकड़े मिले हैं जो न सिर्फ हमारे सौरमंडल बल्कि मंगल ग्रह और चांद से भी आए हुए हैं।
इन उल्कापिंडों को देखकर वैज्ञानिक यह समझने की कोशिश करते हैं कि हमारी पृथ्वी कैसे बनी, ब्रह्मांड का निर्माण कैसे हुआ और क्या किसी और ग्रह पर जीवन की संभावना रही है? यह विशाल जगह सिर्फ किसी रहस्य या दूसरी दुनिया से जुड़े राज से ही नहीं जुड़ी हुई है, बल्कि यहां पर लाखों और हजारों साल पहले ऐसे-ऐसे प्राचीन जीवों के निशान मिले हैं जिनके बारे में जानकर वैज्ञानिक भी सोच में पड़ गए। अंटार्कटिका की बर्फ के नीचे वैज्ञानिकों ने कई फॉसिल्स, जीवाश्म खोजे जिन्होंने दुनिया को चौंका दिया। साल 1980 के दशक में यहां से करीब 70 मिलियन साल पुराने समुद्री जीवों के जीवाश्म निकले।
लेकिन सबसे बड़ा रहस्य तब सामने आया जब वैज्ञानिकों को यहां विशालकाय पेंग्विन, जॉइंट पेंग्विन के फॉसल्स मिले। सोचिए जहां आज के जमाने में पेंगुइन की ऊंचाई मुश्किल से 3 से 4 फीट होती है, वहीं उस दौर में अंटार्कटिका में रहने वाले पेंगुइन की ऊंचाई 6 से 7 फीट और वजन 100 किलो से भी ज्यादा हुआ करता था। यानी यह पेंग्विन एक इंसान के बराबर बड़े थे। इतना ही नहीं, इन जीवाश्मों ने यह भी साबित किया कि लाखों साल पहले अंटार्कटिका हमेशा बर्फ से ढका हुआ नहीं था। उस समय यह जगह हरी-भरी और गर्म थी, जहां अलग-अलग समुद्री और जमीनी जीव पनपते थे।
इन खोजों ने वैज्ञानिकों को यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि जलवायु परिवर्तन ने सिर्फ धरती का नक्शा ही नहीं बदला बल्कि यहां रहने वाले जीव-जंतुओं और सभ्यताओं का भी अंत कर दिया। यह विशाल पेंग्विन और प्राचीन जीव हमें यह याद दिलाते हैं कि अंटार्कटिका सिर्फ बर्फ का महाद्वीप नहीं बल्कि यह पृथ्वी के इतिहास की जीवित किताब है। अंटार्कटिका को हम सब बर्फ और ठंड का घर मानते हैं, लेकिन यही महाद्वीप एक और रहस्य समेटे हुए है। दरअसल, यहां बर्फ के बीच छिपा है एक सक्रिय ज्वालामुखी जिसका नाम है माउंट एरेबस। वैज्ञानिकों ने पहली बार इसकी गहराई से खोजबीन 1970 के दशक में शुरू की थी।
और तब यह खुलासा हुआ कि रॉस आइलैंड पर मौजूद यह ज्वालामुखी दुनिया का सबसे दक्षिणी सक्रिय ज्वालामुखी है। माउंट एरीबस की ऊंचाई लगभग 3794 मीटर है, और सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इसकी चोटी पर एक स्थाई लावा झील मौजूद है। यह लावा झील लगातार हजारों सालों से उबल रही है, और वैज्ञानिकों के रिकॉर्ड के अनुसार 1972 से लेकर आज तक इसमें निरंतर गतिविधि देखी जा रही है। लेकिन रहस्य यहीं खत्म नहीं होता। माउंट एरीबस के अंदर और उसके आसपास वैज्ञानिकों ने ऐसी आइस केव्स खोजी हैं जो ज्वालामुखी की गर्मी की वजह से बनीं।
इन गुफाओं के अंदर तापमान बाहर की तुलना में काफी गर्म होता है, और इन्हीं गुफाओं में वैज्ञानिकों को ऐसे सूक्ष्म जीव, माइक्रो ऑर्गेनिज्म्स और रहस्यमई संरचनाएं मिलीं जो पहले कभी नहीं देखी गई थीं। यह खोज इसलिए चौंकाने वाली थी क्योंकि इतनी ठंडी जगह में भी जीवन किसी ना किसी रूप में जिंदा था। माउंट एरेबस की यह खोज यह साबित करती है कि पृथ्वी का सबसे ठंडा महाद्वीप सिर्फ बर्फ से ढका हुआ नहीं है बल्कि इसके नीचे आग और जीवन दोनों का राज छिपा है।
अब अगर बात करें अंटार्कटिका के सबसे बड़े ज्वालामुखी की तो वह है माउंट सिडली। इसकी ऊंचाई लगभग 4181 मीटर है और यह अंटार्कटिका का सबसे ऊंचा और विशाल ज्वालामुखी माना जाता है। हालांकि यह निष्क्रिय है, लेकिन इसके आकार और संरचना को देखकर वैज्ञानिक मानते हैं कि लाखों साल पहले इसमें भी भयंकर विस्फोट हुआ होगा। अंटार्कटिका की बर्फीली सतह के नीचे ऐसे रहस्य छिपे हुए हैं जो विज्ञान को भी हैरान कर देते हैं।
इन्हीं में से सबसे चौंकाने वाली खोज है लेक वोस्टॉक, एक विशाल झील जो लगभग 4 किलोमीटर मोटी बर्फ के नीचे दबकर लाखों सालों से छिपी हुई है। इस झील की पहचान सबसे पहले 1950 के दशक में सोवियत वैज्ञानिकों ने की थी और बाद में 1996 में ब्रिटिश और रूसी वैज्ञानिकों की टीम ने सैटेलाइट रडार सर्वे से इसकी मौजूदगी की पुष्टि कर दी। लेक वो वोस्टॉक वाकई बहुत बड़ी है। इसकी लंबाई लगभग 250 किमी, चौड़ाई 50 किमी और गहराई 1200 मीटर तक है।
यानी यह पूरी तरह से एक पानी का महासागर है जो बर्फ की चादर के नीचे कैद है। अब आप सोच रहे होंगे कि क्या सिर्फ यही एक झील है? तो आपको जानकर हैरानी होगी कि अभी तक वैज्ञानिकों ने अंटार्कटिका की बर्फ के नीचे लगभग 400 से भी ज्यादा सबग्लेशियर लेक्स यानी जमीन के नीचे दबी झीलें खोज निकाली हैं। लेकिन इन सब में सबसे बड़ी और सबसे रहस्यमई झील है लेक वोस्टॉक। 2012 में रूसी वैज्ञानिकों ने जब यहां तक पहुंचने के लिए ड्रिलिंग की और पानी के नमूने निकाले तो वहां से जो नतीजे सामने आए वह दिमाग हिला देने वाले थे।
नमूनों में ऐसे हजारों तरह के सूक्ष्म जीव, माइक्रोब्स और अज्ञात डीएनए मिले जो पृथ्वी की किसी और जगह पर नहीं पाए जाते। यानी यह झील पूरी तरह से अलग-थलग थी और यहां जीवन ने अपना एक बिल्कुल ही अलग रास्ता अपनाया। कुछ वैज्ञानिकों का दावा है कि यहां ऐसे सूक्ष्म जीव मिले जो अत्यधिक दबाव, अंधेरे और ठंडे वातावरण में जीवित रहते हैं और यह प्रजातियां इंसानों के लिए पूरी तरह अज्ञात हैं। कई बार तो यह भी कहा जाता है कि यहां ऐसे जीवन रूप छिपे हो सकते हैं जिन्हें देखकर हमें लगे कि वे किसी और ही दुनिया से आए हैं।
अंटार्कटिका के रहस्यों की दुनिया में कुछ ऐसा हुआ जिसे सुनकर आप दंग रह जाएंगे। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद 30 अप्रैल 1945 को हिटलर ने कथित रूप से खुद को मार लिया था। लेकिन कई इतिहासकारों और शोधकर्ताओं का मानना है कि यह केवल नकली हमशक्ल डॉपल गैंगर था। असली हिटलर कहीं अंटार्कटिका जैसी दूरस्थ और बर्फ से ढकी जगह में सुरक्षित छिप गया था। उसने वहां अपने लिए एक गुप्त ठिकाना बनाया ताकि अलाइड देश यानी युद्ध में विजय संयुक्त राष्ट्र और उनके सहयोगी देश उसे पकड़ ना सकें। हिटलर का यह गुफा में छुपने वाला प्लान इस व्यक्ति ने भी लिखा था।
लाडिसलास जाबो ने अपनी किताब नाजी अंटार्कटिक एक्सप्लोरेशन: हिटलर’स एस्केप टू साउथ अमेरिका एंड सीक्रेट नाज़ी बेसिस इन अंटार्कटिका में किया। जाबो ने लिखा कि अंटार्कटिका में हिटलर ने एक बड़ी गुफा में जाकर खुद को छिपाया। हिटलर ने अंटार्कटिका में एक विशाल गुफा खोजी और वहां जाकर खुद को छिपाया। इसके बाद अमेरिका ने उसे ढूंढने और अंटार्कटिका में गुप्त गतिविधियों का पता लगाने के लिए ऑपरेशन हाई जंप शुरू किया।
इस मिशन का नेतृत्व एडमिरल रिचर्ड बर्ड ने किया। इस अभियान में शामिल थे 13 जहाज, 23 विमान और लगभग 4700 सैनिक। बर्ड और उनकी टीम साउथ पोल की ओर बढ़े और अंटार्कटिका के अज्ञात हिस्सों का अध्ययन करने लगे। बर्ड ने अपनी डायरी में लिखा कि उन्हें दक्षिण ध्रुव में एक विशाल गुफा दिखाई दी। जब वे उस गुफा के अंदर गए, तो उन्होंने देखा कि वहां हजारों फीट तक विशाल पेड़ और जंगल और सबसे अद्भुत क्रिस्टल से बना चमकता हुआ शहर मौजूद था।
जैसे ही बर्ड इस शहर में पहुंचा, उसने देखा कि चार-पांच यूएफओ उड़ रहे थे और वे एक सुरक्षित जगह पर उतर गए। वहां उसे दो अलग तरह के प्राणी दिखाई दिए। इंसान जैसी शक्ल लेकिन पूरी तरह एलियन जैसी विशेषताएं। बर्ड ने इस प्राणी का नाम अपनी डायरी में मास्टर रखा। मास्टर ने बर्ड से कहा, तुम लोगों ने दुनिया में बहुत बड़े विस्फोट किए हैं, खासकर हिरोशिमा और नागासाकी में। इसकी वजह से हमारी दुनिया खतरे में है।
इसे अब तुरंत रोक दो। इस चेतावनी के बाद बर्ड को छोड़ दिया गया। बर्ड ने यह पूरा अनुभव अपनी डायरी में लिखा और दुनिया को बताने का मन बनाया। लेकिन उसके बाद सरकार ने आदेश दिया कि इसे गोपनीय रखा जाए और यह रहस्य केवल बर्ड और उसके स्टाफ तक ही सीमित रहा। यह कहानी हमें सोचने पर मजबूर करती है कि अंटार्कटिका सिर्फ बर्फ और ठंड का महाद्वीप नहीं है। यह सब बातें सुनकर यही लगता है कि अंटार्कटिका के पूरे इलाके में लाखों साल पहले जमीन, जंगल, इंसान और जानवर रहते थे।
यह सारी बातें इस ओर इशारा करती हैं कि आज भले ही यहां इंसानों का रह पाना नामुमकिन सा हो, लेकिन कभी किसी समय यहां जीवन मौजूद था. यानी कि इस जगह के बारे में अब भी बहुत से रहस्य छिपे हुए हैं. लेकिन आज के लिए बस इतना ही. हम लोग फिर मिलेंगे किसी दूसरे भाग या अगले पाठ में.
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