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Dam disasters : इतिहास के 5 सबसे विनाशकारी डैम हादसे

Dam disasters

आज हम बात करने वाले हैं इतिहास के पांच ऐसे खतरनाक डैमों के बारे में जिनके टूटने के बाद पूरे शहर और गांव हमेशा के लिए मिट गए। यह वही डैम थे जो लोगों को बिजली, पानी और जरूरी सुविधाएं देते थे। लेकिन एक दिन इन अटूट माने जाने वाले डैमों ने अपनी ताकत दिखाई और अपने साथ अनगिनत जिंदगियां, घर, पुल और खेत बहा ले गए। सोचिए जहां एक ओर यह डैम लोगों की जिंदगी को आसान बनाते थे वहीं दूसरी ओर जब यह फटे तो एक पल में मौत की दीवार बनकर हर चीज को निगल गए। घरों में लोग अपने रोजमर्रा के काम कर रहे थे। बच्चे खेल रहे थे और एक पल में ही लाखों टन पानी की भयंकर लहर उनके दरवाजों तक पहुंच गई। यह सिर्फ आंकड़े नहीं बल्कि उन अनगिनत किस्सों की कहानी है जहां परिवार, खुशियां और जिंदगी पानी में डूब गई। यह घटनाएं इतनी भयानक थी कि देखदे कर रोंगटे खड़े हो जाए। आप महसूस करेंगे कि इंसान चाहे कितनी भी तकनीक क्यों ना बना ले प्रकृति की ताकत के सामने वह हमेशा छोटा है। आज हम जानेंगे कि कैसे एक डैम फटने के बाद पूरा गांव और शहर इतिहास में हमेशा के लिए गुम हो गया।

मालपसेट डैम फ्रांस

कहानी शुरू होती है 2 दिसंबर 1959 की रात लगभग 21:13 पर जब फ्रांस के दक्षिणी हिस्से में रेन घाटी में स्थित मालपासेट बांध अचानक फट पड़ा। यह बांध पिछले कुछ दिनों की लगातार भारी बारिश के बाद पहले से ही पूरा भरा हुआ था। रात के अंधेरे में बांध की दक्षिणी दीवार में मौजूद भूवैज्ञानिक कमजोरी, चट्टान में दरारें और नीव की अस्थिर मिट्टी और पानी के बढ़ते दबाव का मेल हुआ। उसी पल बांध का बड़ा हिस्सा अलग होकर टूट गया और पीछे जमा पानी एक साथ नीचे की ओर फट पड़ा।

टूटते ही पानी एक ऊंची हिंसक लहर बन गया जिसमें मलबा, पेड़ और बड़े कंक्रीट के टुकड़े भी थे। पहली लहर शोर और धुआं सा उठते हुए घाटी में झट से उतर गई और बांध के ठीक नीचे बसे छोटे गांव मालपसेठ और बोझन उसी समय पूरी तरह चपेट में आ गए। कई घर, एक सड़क निर्माण शिविर और खेत क्षणों में बहकर नष्ट हो गए और बहुत से लोग फंसे रह गए।

लहर आगे बढ़ती हुई लगभग 10 से 12 किमी तक तबाही फैलाती हुई पहुंची और सबसे नजदीकी बड़ा कस्बा फ्रेजूस तक पानी पहुंचने में करीब 20 से 25 मिनट लगे। तब तक रास्ते और पुल मलबे से बंद हो चुके थे। इसलिए बचाव दलों का पहुंच पाना बहुत कठिन हो गया। पानी ने घरों और खेतों के साथ-साथ रेलवे ट्रैक, सड़कों, पुलों, बिजली और पानी की लाइनों को उखाड़ दिया। अंगूर के बाग और खेती योग्य जमीन को भारी नुकसान हुआ।

आधिकारिक जांच और रिकॉर्ड के अनुसार इस दुर्घटना में कुल मिलाकर लगभग 423 लोग मरे। कई की मौत घरों के ढहने, तेज बहते पानी में बह जाने और मलबे के नीचे दब जाने से हुई। सैकड़ों घायल और हजारों लोग बेघर हुए। राहत और बचाव कार्यों में देर इसलिए हुई क्योंकि मुख्य मार्ग कट चुके थे और इलाका मलबे से भरा हुआ था।

यह घटना स्पष्ट कर गई कि स्थलाकृतिक सर्वे और नींव की सही जांच की कमी जब तेज बारिश जैसे प्राकृतिक दबाव से मिलती है तो परिणाम कितने भयानक हो सकते हैं। मालपासेट का टूटना बांध इंजीनियरिंग और सुरक्षा मानकों में सुधार की एक कड़ी चेतावनी बनकर रह गया।

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यह दृश्य टूटे कंक्रीट के टुकड़े, बहते पेड़ और बिखरे घर का था। ऐसा था कि जिसे देखकर कोई भी लंबे समय तक सोच में डूब जाता है। जिन लोगों ने वह रात जिंदा देखी, उनकी यादें आज भी उन घड़ियों के दुस्वप्न की तरह ताजा रहती हैं। अब हम आगे बढ़ते हैं। अगली घटना और भी दिल दहलाने वाली है। चलो बात करते हैं दूसरे बासदी के बारे में जो सुनते ही रूह कांप जाए।

वाजोंट डैम इटली

कहानी शुरू होती है 9 अक्टूबर 1963 की सुबह जब इटली के उत्तर-पूर्वी हिस्से में पियावे नदी पर बने वाजोंट डैम के पास एक भयानक त्रासदी घटित हुई। यह डैम लगभग 262 मीटर ऊंचा और लगभग 1900 मीटर लंबा था। सामान्य परिस्थितियों में डैम का जलाशय लगभग 100 मीटर तक भरा रहता था, लेकिन लगातार कई दिनों तक हो रही भारी बारिश के कारण पानी का स्तर अचानक बढ़कर लगभग 120 मीटर तक पहुंच गया था।

इससे डैम के किनारे और आसपास की ढलान वाली पहाड़ी पर दबाव असामान्य रूप से बढ़ गया और पहाड़ी की मिट्टी अस्थिर हो गई। इस समय डैम पूरी क्षमता से भरा हुआ था और जलाशय का पानी पहाड़ी पर भारी दबाव डाल रहा था। उसी समय पहाड़ी का विशाल हिस्सा अचानक फिसल गया और लगभग 260 मिलियन घन मीटर मिट्टी और चट्टान सीधे जलाशय में गिर पड़े। इसके कारण पानी में अचानक विस्थापन हुआ और लगभग 200 मीटर ऊंची लहर उठी।

यह लहर इतनी विशाल और तेज थी कि वह डैम के ऊपर से बहकर नीचे की घाटियों की ओर फैल गई। नीचे बसे गांव लंगारोने, पिरागो, विलानोवा और रिवोल्टा लगभग 8 से 10 किमी दूर स्थित थे। लहर ने केवल 10 से 15 मिनट में इन गांवों तक पहुंचकर उन्हें पूरी तरह तहस-नहस कर दिया। घर, सड़कें, पुल, रेलवे लाइनें और अन्य सभी इंफ्रास्ट्रक्चर लहर की चपेट में बह गए। इस भीषण त्रासदी में लगभग 2000 लोग मारे गए।

कई सैकड़ों घायल हुए और हजारों लोग बेघर हुए। सुबह के नाश्ते का शांत माहौल अचानक नरक में बदल गया। जो लोग अपने घरों में थे वे भी इस भयंकर लहर और मलबे के सामने टिक नहीं पाए। डैम खुद सुरक्षित रहा क्योंकि इसका निर्माण ठोस और मजबूत था। लेकिन पहाड़ी से गिरा विशाल मलबा और पानी का विस्थापन इतना भयानक था कि नीचे बसे गांवों में कोई भी बच नहीं पाया।

पहले यह जगह एक शांत, हंसती-खेलती घाटी थी, जहां लोग अपने घरों में रहते थे, बच्चे खेलते थे और सुबह की धूप का आनंद लेते थे. लेकिन आज यह जगह पूरी तरह नरक में बदल गई है. खंडहर, टूटे हुए घर, उखड़े पेड़ और सूखी, उजड़ी घाटियां उस भयानक घटना की याद दिलाती हैं. यह दृश्य यह दिखाता है कि प्राकृतिक दबाव और मानवीय अनदेखी कितनी भयानक तबाही ला सकती है. अब हम आगे बढ़ते हैं. अगली घटना और भी दिल दहलाने वाली है, जिसे सुनते ही रूह कांप जाए.

साउथ फोक डैम्प जॉनसन यूएसए

कहानी शुरू होती है 31 मई 1889 की दोपहर जब अमेरिका के पेंसिलवेनिया राज्य में स्थित साउथ फोर्क डैम ने इतिहास की सबसे भयानक त्रासदियों में से एक को जन्म दिया। यह डैम 1852 से 1853 के बीच बनाया गया था, जिसकी ऊंचाई लगभग 22 मीटर और लंबाई लगभग 280 मीटर थी। इसका निर्माण मूल रूप से पेंसिलवेनिया कैनाल सिस्टम के लिए जलाशय बनाने हेतु किया गया था, लेकिन समय के साथ इसका रखरखाव कमजोर होता गया।

साउथ फोर्क डैम के पीछे स्थित जलाशय को लेक कॉनम्यू कहा जाता था, जो लगभग 450 एकड़ में फैला हुआ था और जिसमें अरबों गैलन पानी जमा रहता था। शुरुआत में पानी का स्तर संतुलित रहता था, लेकिन 1889 के मई महीने में लगातार कई दिनों तक हुई भारी बारिश ने हालात बिगाड़ दिए। पानी का स्तर तेजी से बढ़ने लगा और डैम के ऊपर से बहने लगा।

सबसे बड़ी समस्या यह थी कि डैम की मरम्मत और रखरखाव में लापरवाही की गई थी। मजबूत इस पिलवे को हटा दिया गया था जिससे अतिरिक्त पानी को सुरक्षित बाहर निकालने का कोई साधन नहीं बचा था। 31 मई की दोपहर लगभग 3:10 पर डैम के बीच का हिस्सा अचानक टूट गया।

उस समय जलाशय में लगभग 20 मिलियन टन पानी जमा था जो पल भर में नीचे की ओर बह निकला। यह पानी एक विशाल दीवार की तरह घाटियों की ओर बढ़ा। लहर की ऊंचाई कहीं-कहीं 18 मीटर तक पहुंच गई और गति इतनी तेज थी कि रास्ते में आने वाले पेड़, घर, रेलगाड़ियां और पुल सब बहते चले गए।

नीचे बसा जॉन्सटाउन शहर डैम से लगभग 23 कि.मी. दूर था। पानी की यह विनाशकारी लहर केवल 1 घंटे से भी कम समय में वहां पहुंच गई और पूरे शहर को निगल लिया। जो लोग अपने घरों में बैठे थे, वे अचानक उठी पानी की दीवार को देखकर कुछ समझ ही नहीं पाए। जॉनस्टाउन शहर मिनटों में तबाह हो गया।

इस त्रासदी में लगभग 2200 लोग मारे गए। हजारों घर नष्ट हो गए। सैकड़ों लोग लापता हुए और पूरा इलाका खंडहर में बदल गया। लोगों की लाशें और मलबा कई किलोमीटर दूर तक बहते पाए गए। शहर का लगभग हर पुल बह गया और रेलवे लाइनें टूट कर बिखर गईं। जॉन्स टाउन, जो कभी एक शांत और विकसित औद्योगिक शहर था, कुछ ही पलों में मौत और मलबे का मैदान बन गया। यह घटना अमेरिका के इतिहास की सबसे भयानक आपदाओं में गिनी जाती है। अब हम आगे बढ़ते हैं। अगली घटना और भी खौफनाक है जिसे सुनकर आपकी रूह कांप उठेगी।

मच्छु डैम दे इंडिया

यह कहानी है भारत के गुजरात राज्य की, जहां 11 अगस्त 1979 को हुई एक भयावह त्रासदी ने पूरे देश को हिलाकर रख दिया। यह घटना जुड़ी है माचू डैम टू से, जो मोरबी शहर के पास माचू नदी पर बनाया गया था। यह डैम 1972 में पूरा हुआ था। इसे मुख्य रूप से सिंचाई और बाढ़ नियंत्रण के लिए तैयार किया गया था।

लेकिन जिस डैम को लोगों की सुरक्षा और जीवन बेहतर बनाने के लिए बनाया गया था, वही कुछ साल बाद मौत और तबाही का कारण बन गया। 1979 की अगस्त की शुरुआत में गुजरात में लगातार कई दिनों तक भारी बारिश होती रही। माछू नदी का जलस्तर लगातार बढ़ता गया और डैम पर पानी का दबाव असामान्य रूप से बढ़ चुका था।

11 अगस्त को दोपहर करीब 3:15पर अचानक डैम की दीवार टूट गई। जैसे ही डैम टूटा लाखों क्यूसिक पानी एक भयानक लहर की तरह नीचे की ओर बहा। मोरबी शहर डैम से मात्र 5 किलोमीटर दूर था। इसलिए पानी को वहां तक पहुंचने में केवल 20 मिनट से भी कम समय लगा। उस समय शहर में हजारों लोग अपने-अपने कामों में व्यस्त थे।

लेकिन किसी ने सोचा भी नहीं था कि अगले कुछ ही मिनटों में उनका संसार पूरी तरह तबाह हो जाएगा। पानी ने मोरबी शहर को अपनी चपेट में ले लिया। पूरा बाजार, घर, दुकानें, मंदिर, पुल और कारखाने बाढ़ की लहरों में बह गए। जानवर बहकर मर गए और शहर के पुल टूट कर नदी में समा गए। इस आपदा में अनुमानित तौर पर 10,800 से 2500 लोग मारे गए। हजारों लोग बेघर हो गए और सैकड़ों परिवार हमेशा के लिए बिखर गए।

मोरबी जो कभी खुशियों और रौनक से भरा था, कुछ ही पलों में मलबे और लाशों के ढेर में बदल गया। यह त्रासदी भारत के इतिहास की सबसे बड़ी डैम दुर्घटनाओं में गिनी जाती है। मोरबी जो कभी हंसता-खेलता खूबसूरत शहर था, कुछ ही मिनटों में मौत और तबाही के अंधेरे में डूब गया।

बकिया डैम, चाइना

यह कहानी शुरू होती है अगस्त 1975 में जब चीन के हिनान प्रांत पर टाइफून नीना का कहर टूटा। लगातार कई दिनों तक मूसलधार बारिश हुई, और यह बारिश इतनी ज्यादा थी कि कुछ ही दिनों में पूरे साल की औसत वर्षा से भी ज्यादा पानी गिर पड़ा। यह पानी सीधे जमा होने लगा बंक याओ बांध में। यह बांध साल 1950 के दशक में बनाया गया था। इसकी ऊंचाई लगभग 25 मीटर और लंबाई लगभग 500 मीटर थी।

इसे मुख्य रूप से बाढ़ से बचाने और खेती के लिए पानी संग्रहित करने के उद्देश्य से तैयार किया गया था। लेकिन इसकी सबसे बड़ी कमजोरी थी पानी निकालने की क्षमता, जो इस आपदा का मूल कारण साबित हुई। बारिश रुकने का नाम नहीं ले रही थी और बांध का जलस्तर लगातार ऊपर चढ़ रहा था। रात के अंधेरे में 8 अगस्त 1975 को बांध आखिरकार दबाव नहीं झेल सका और टूट गया। जैसे ही बांध टूटा, पानी की एक विशाल दीवार घाटी की ओर टूट पड़ी।

इस लहर की ऊंचाई कई मंजिलों के बराबर थी और इसकी रफ्तार इतनी तेज थी कि कुछ ही मिनटों में नीचे बसे गांव और कस्बे पानी की चपेट में आ गए। अनुमान है कि केवल आधे घंटे के भीतर दर्जनों गांव पूरी तरह बह गए। लोग सो रहे थे। किसी को भागने का समय भी नहीं मिला। बाढ़ की इस विभीषिका ने घरों, खेतों, सड़कों, पुलों और पूरे-पूरे कस्बों को निगल लिया।

आधिकारिक तौर पर इस घटना में लगभग 26,000 लोग तुरंत मारे गए। लेकिन असली तबाही यहीं खत्म नहीं हुई। जब पानी उतरने लगा तो बीमारी और अकाल ने हजारों और जिंदगियां निगल लीं। कुल मिलाकर मृतकों की संख्या लाखों तक पहुंच गई और करोड़ों लोग बेघर हो गए। प्रभावित क्षेत्र हजारों वर्ग किलोमीटर में फैला था। सोचिए जहां कभी हरे-भरे खेत और आबाद बस्तियां थीं, वहां कुछ ही घंटों में मौत और तबाही का सन्नाटा छा गया। यह हादसा इस बात का प्रतीक है कि जब प्रकृति का गुस्सा और इंसानी लापरवाही एक साथ मिल जाएं तो नतीजा कितना भयानक हो सकता है।

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