आखिर किसने की थी कावड़ यात्रा की शुरुआत ?

-: The First Kanwar yatra :-
एक ऐसा मंदिर जहां से शुरू हुई थी कावड़ यात्रा की प्रथा। आखिर किसने चढ़ाया था शिवलिंग पर सबसे पहले जल? कावड़ यात्रा शिव के भक्तों के लिए किसी तीर्थ यात्रा से कम नहीं है। हर साल लाखों कावड़िया हरिद्वार में पहुंच पवित्र गंगा नदी से पैदल चलकर जल लाते हैं और सावन शिवरात्रि पर अपने क्षेत्र के शिवालयों में शिवलिंग का जल अभिषेक करते हैं। यह एक कठिन यात्रा होती है। लेकिन क्या कभी आपने सोचा है कि आखिर इसकी शुरुआत कैसे हुई थी? हमारे पुराणों में कावड़ यात्रा से जुड़ी कौन सी कथा का वर्णन है? और सबसे पहले कावड़ीय कौन थे?
उत्तर प्रदेश के बाजपत में एक ऐसा शिवलिंग आज भी मौजूद है जिसमें सर्वप्रथम कावड़ यात्रा कर जल चढ़ाया गया था। यह है पूरा महादेव मंदिर। ऐसी मान्यता है कि सर्वप्रथम यहां पर भगवान परशुराम ने कावड़ लाकर भगवान भोलेनाथ को जल चढ़ाया था और तभी से कावड़ यात्रा की शुरुआत हुई थी। मान्यताओं के अनुसार गढ़मुक्तेश्वर से गंगा जी का जल लाकर पैदल यात्रा कर लगभग सात बार उन्होंने इस पुरातन शिवलिंग पर जला अभिषेक किया था।
उसी का नतीजा है कि आज भी उसी परंपरा का अनुपालन करते हुए श्रावण मास में गण मुक्तेश्वर, जिसका वर्तमान नाम ब्रज घाट है, वहां से श्रावण मास में जल लाकर लाखों भक्त मेरठ से तकरीबन 50 कि.मी. दूर बलौनी कस्बे में एक छोटे से गांव पूरा में भगवान शिव के इस प्राचीन शिवलिंग पर जल चढ़ाकर अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति करते हैं। अब भगवान परशुराम के कावड़ यात्रा शुरू करने और शिवलिंग पर जल चढ़ाने के पीछे एक महत्वपूर्ण कथा छुपी हुई है।
मान्यता है कि परशुराम जी के समय पर पहले यहां पर कजरी नामक एक वन हुआ करता था। इसी वन में ऋषि जगदंबनी अपनी पत्नी रेणुका और पुत्रों सहित इसी आश्रम में रहते थे। रेणुका प्रतिदिन कच्चा घड़ा बनाकर हिंडन नदी से जल भरकर लाती थी और वही जल भगवान शिव को अर्पण किया करती थी। एक बार जब माता रेणुका जल लेने गई तो वहां गंधर्वों को जल क्रीड़ा करते हुए देखकर वह मोहित हो गई।
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जब ऋषि जगदमनी को यह पता चला तो उन्होंने क्रोधित होकर अपने पुत्रों को रेणुका का वध करने का आदेश दिया। माता रेणुका ने अपने पति से बार-बार प्रार्थना की कि वह पूर्णतः पवित्र है और अगर उन्हें विश्वास नहीं है तो वह अपने हाथों से उन्हें मार दें ताकि पति के हाथों मरकर वह मोक्ष को प्राप्त हो जाए। परंतु ऋषि अपने आदेश पर अडिग रहे। इसके बाद ऋषि ने अपने तीनों पुत्रों को उनकी माता का सिर धड़ से अलग करने के लिए कहा।
लेकिन सबने इंकार कर दिया। चौथे पुत्र परशुराम जी ने पितृ आज्ञा को अपना धर्म मानते हुए अपनी माता का सिर धड़ से अलग कर दिया। बाद में परशुराम जी को इसका घोर पश्चाताप हुआ। माता की हत्या के पाप से मुक्ति के लिए उन्होंने घोर तपस्या आरंभ कर दी। वह उसी शिवलिंग की पूजा करने लगे जिसकी पूजा उनकी माता भी किया करती थी। एक दिन उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें प्रत्यक्ष दर्शन दिए और कहा कि उनकी माता की भांति उन्हें भी शिवलिंग पर जल अर्पित करना होगा।
लेकिन उन्हें यह कार्य उसी जगह से यात्रा करके पूर्ण करना होगा जहां से उनकी माता रोज जल लाया करती थी। गढ़मुक्तेश्वर, जिसे प्राचीन काल में शिवल्लमपुर के नाम से जाना जाता था और वर्तमान समय में यह गंगा नदी के किनारे और हापुड़ जिले में स्थित एक कस्बा है, वहीं से अपनी माता की भांति परशुराम जी गंगाजल कावड़ में लाकर पूरा महादेव मंदिर में चढ़ाया करते थे और तभी से कावड़ यात्रा की शुरुआत हुई।
कहते हैं यह गंगा नदी के किनारे होने के कारण यहां गंगा घाट और मंदिर जैसे मुक्तेश्वर महादेव मंदिर बहुत ही दर्शनीय स्थल हैं। सिर्फ यही नहीं, यहां परशुराम काल में मौजूद बहुत से मंदिर हैं। कहते हैं परशुराम जी ने जब राजा सहस्त्रबाहु से बदला लेने के लिए युद्ध किया और अपने फरसे से संपूर्ण सेना सहित राजा सहस्त्रबाहु को मार दिया, तो जिस स्थान पर शिवलिंग की स्थापना की वहां पर एक मंदिर भी बनवाया गया।
यह मंदिर परशुरामेश्वर मंदिर के नाम से आज भी विख्यात है। वहीं पूरा महादेव मंदिर के अलावा वेस्ट यूपी में कई सारे ऐसे मंदिर हैं जहां अलग-अलग इतिहास मौजूद है। यहां भी कावड़िये गंगाजल लाकर चढ़ाते हैं। इसी कड़ी में गाजियाबाद का दुधेश्वर महादेव मंदिर भी है। वहीं मेरठ के बिल्लेश्वर नाथ महादेव मंदिर के बारे में मान्यता है कि यहां पर रावण की पत्नी मंदोदरी भगवान शिव के पूजन के लिए आया करती थी।
साथ ही कुछ किंवदंतियाँ कहती हैं कि सर्वप्रथम कावड़ यात्रा की शुरुआत श्रवण कुमार से होती है जो अपने अंधे माता-पिता को कावड़ पर बैठाकर इसी मंदिर में दर्शन के लिए लाए थे। तो दोस्तों, क्या आपको पता था कि सबसे पहले कावड़ यात्रा कैसे शुरू हुई थी और प्रथम कावड़ीय कौन थे?
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